मूल 1857 का विद्रोह, क्राउन का अधिग्रहण और भारत शासन अधिनियम 1858
1857 का विद्रोह कोई अचानक फूटा हुआ सैनिक उपद्रव नहीं था, बल्कि राजनीतिक विलय, ग्रामीण संकट और सैन्य असंतोष से बना हुआ व्यापक विस्फोट था। इसका राजनीतिक आधार राज्य-हड़प नीति से तीखा हुआ, जिसे लॉर्ड डलहौजी ने सतारा 1848, झांसी 1853 और नागपुर 1854 जैसे राज्यों के विलय में लागू किया, जबकि अवध को 1856 में कुशासन के आरोप पर मिला लिया गया। इन कदमों ने राजाओं, तालुकेदारों और दरबारी अभिजात वर्ग को असुरक्षित बना दिया। अवध इसलिए भी निर्णायक था क्योंकि बंगाल सेना के अनेक सिपाही वहीं के गांवों से आते थे; 1856 के बाद स्थानीय अभिजात वर्ग की हानि और सैनिक असंतोष एक-दूसरे से जुड़ गए। किसानों पर भारी भू-राजस्व का दबाव था, और सिपाहियों में कम वेतन, दूरस्थ नियुक्ति तथा भत्ते के ह्रास को लेकर रोष बढ़ रहा था। धार्मिक आशंका तब गहरी हुई जब एनफील्ड राइफल के कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी होने की चर्चा फैली, जिससे कम्पनी शासन दोनों प्रमुख धार्मिक समुदायों की भावनाओं के विरुद्ध दिखाई देने लगा। बाजारों और छावनियों में फैलती अफवाहों ने यह भय और गहरा किया कि कम्पनी समाज और धर्म दोनों को बदलना चाहती है। मेरठ से पहले ही चिंगारी बैरकपुर में दिखी, जहाँ मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को अपने अधिकारियों पर आक्रमण किया। व्यापक विस्फोट 10 मई 1857 को मेरठ में हुआ, जब बंदी बनाए गए सिपाहियों को छुड़ाया गया और विद्रोही 11 मई 1857 को दिल्ली पहुँचे। वहीं बहादुर शाह ज़फर को हिंदुस्तान का सम्राट घोषित किया गया, जिससे विद्रोह को वैध शाही प्रतीक मिल गया। दिल्ली विद्रोहियों के शाही केंद्र में बदलते ही घोषणाएँ, राजस्व-संग्रह और पुरानी मुगल वैधता की अपीलें सैनिक विद्रोह को राजनीतिक युद्ध का रूप देने लगीं। यह आंदोलन तेजी से कई केंद्रों में फैल गया: दिल्ली में बख्त खान, कानपुर में नाना साहेब और तात्या टोपे, लखनऊ में बेगम हज़रत महल, झांसी में रानी लक्ष्मीबाई और बिहार में कुंवर सिंह इसके प्रमुख चेहरे बने। फिर भी यह मोर्चा एकसमान नहीं था, क्योंकि कुछ शासक विद्रोह में आए, कुछ प्रतीक्षा करते रहे और अनेक रियासतों ने अपने अस्तित्व के लिए अंग्रेजों का साथ दिया। अंग्रेजी दमन क्रमिक और अत्यंत कठोर था। दिल्ली 20 सितंबर 1857 को पुनः अंग्रेजों के कब्जे में आई; लखनऊ मार्च 1858 में वापस लिया गया; कुंवर सिंह की मृत्यु 9 मई 1858 को हुई; रानी लक्ष्मीबाई 17 जून 1858 को ग्वालियर में वीरगति को प्राप्त हुईं; और तात्या टोपे लंबे गुरिल्ला संघर्ष के बाद 18 अप्रैल 1859 को फांसी पर चढ़ा दिए गए। इस पूरे आंदोलन का संवैधानिक परिणाम भारत शासन अधिनियम 1858 था, जिसने ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन का अंत करके भारत का प्रशासन सीधे क्राउन को सौंप दिया। कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स और बोर्ड ऑफ कंट्रोल समाप्त कर दिए गए, भारत सचिव ब्रिटेन में मुख्य प्राधिकारी बना, उसकी सहायता के लिए 15-सदस्यीय भारत परिषद बनाई गई, और गवर्नर-जनरल को वायसराय की उपाधि मिली। लॉर्ड स्टैनली पहले भारत सचिव बने, जबकि लॉर्ड कैनिंग नई व्यवस्था के अंतर्गत पहले वायसराय रहे। रानी विक्टोरिया की उद्घोषणा 1 नवंबर 1858 को जारी हुई और लॉर्ड कैनिंग ने इसे इलाहाबाद में पढ़ा; इसमें धर्म में हस्तक्षेप न करने, लोक सेवाओं में समान अवसर देने और आगे के विलयों को सामान्य नीति न बनाने का वचन दिया गया। क्राउन ने निष्ठावान रियासतों को बनाए रखने का संकेत भी दिया, क्योंकि विद्रोह ने अनियंत्रित विस्तार की राजनीतिक लागत स्पष्ट कर दी थी। अंग्रेजों के लिए 1858 केवल सत्ता-परिवर्तन नहीं, बल्कि साम्राज्य के पुनर्गठन का क्षण था, जिसमें व्यापारी कम्पनी की जगह अधिक केंद्रीकृत शाही नौकरशाही ने ले ली। राजस्थान इस विद्रोह को एक अलग क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य देता है। राजपूताना की अधिकांश रियासतों ने अंग्रेजों का साथ दिया, फिर भी मारवाड़ के आउवा में ठाकुर कुषाल सिंह के नेतृत्व में तीखा प्रतिरोध उभरा, और कोटा के विद्रोह में 15 अक्टूबर 1857 को मेजर बर्टन मारा गया। अंतिम चरण में तात्या टोपे की गतिविधियाँ सिरोंज-बांसवाड़ा-प्रतापगढ़-उदयपुर क्षेत्र तक पहुँचीं, और 7 अप्रैल 1859 को पैरों में उसकी गिरफ्तारी ने दिखाया कि विद्रोह का अंतिम प्रभाव राजस्थान की सीमा-रेखा तक फैला हुआ था।
