265. स्वतंत्रता संग्राम एवं राष्ट्रीय आंदोलन
Freedom Struggle & National Movementमूल मुख्य बिंदु
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1857 का विद्रोह विलय नीति, कृषि दबाव, सैनिक असंतोष और धार्मिक आशंका से उभरा तथा भारत शासन अधिनियम 1858 ने कम्पनी शासन समाप्त कर दिया।
- 2
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन 28 दिसंबर 1885 को बंबई में हुआ, जिसमें 72 प्रतिनिधि थे और डब्ल्यू.सी. बनर्जी अध्यक्ष बने।
- 3
बंगाल विभाजन की घोषणा 19 जुलाई 1905 को हुई और 16 अक्टूबर 1905 से लागू होकर स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा को जन-आंदोलन का रूप मिला।
- 4
क्रांतिकारी राष्ट्रवाद अनुशीलन और युगांतर से गदर, एचआरए और एचएसआरए तक गया, जहाँ काकोरी और भगत सिंह ने सशस्त्र कार्रवाई को राजनीतिक संदेश बनाया।
- 5
गांधी ने चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद को अनुशासित सत्याग्रह से जोड़ा, फिर रौलेट दमन और जलियांवाला बाग ने कांग्रेस को असहयोग की ओर मोड़ा।
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दिसंबर 1929 की लाहौर कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को लक्ष्य घोषित किया और 1930 की दांडी यात्रा ने उसे सविनय अवज्ञा में बदल दिया।
- 7
सुभाष चंद्र बोस हरिपुरा और त्रिपुरी की कांग्रेस राजनीति से फॉरवर्ड ब्लॉक, आज़ाद हिंद सरकार और इम्फाल-कोहिमा दिशा की आज़ाद हिंद फौज तक पहुँचे।
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भारत छोड़ो, आज़ाद हिंद फौज मुकदमे, नौसेना विद्रोह, विभाजन और रियासती एकीकरण ने औपनिवेशिक शासन से संवैधानिक राज्य तक अंतिम संक्रमण बनाया।
मूल 1857 का विद्रोह, क्राउन का अधिग्रहण और भारत शासन अधिनियम 1858
1857 का विद्रोह कोई अचानक फूटा हुआ सैनिक उपद्रव नहीं था, बल्कि राजनीतिक विलय, ग्रामीण संकट और सैन्य असंतोष से बना हुआ व्यापक विस्फोट था। इसका राजनीतिक आधार राज्य-हड़प नीति से तीखा हुआ, जिसे लॉर्ड डलहौजी ने सतारा 1848, झांसी 1853 और नागपुर 1854 जैसे राज्यों के विलय में लागू किया, जबकि अवध को 1856 में कुशासन के आरोप पर मिला लिया गया। इन कदमों ने राजाओं, तालुकेदारों और दरबारी अभिजात वर्ग को असुरक्षित बना दिया। अवध इसलिए भी निर्णायक था क्योंकि बंगाल सेना के अनेक सिपाही वहीं के गांवों से आते थे; 1856 के बाद स्थानीय अभिजात वर्ग की हानि और सैनिक असंतोष एक-दूसरे से जुड़ गए। किसानों पर भारी भू-राजस्व का दबाव था, और सिपाहियों में कम वेतन, दूरस्थ नियुक्ति तथा भत्ते के ह्रास को लेकर रोष बढ़ रहा था। धार्मिक आशंका तब गहरी हुई जब एनफील्ड राइफल के कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी होने की चर्चा फैली, जिससे कम्पनी शासन दोनों प्रमुख धार्मिक समुदायों की भावनाओं के विरुद्ध दिखाई देने लगा। बाजारों और छावनियों में फैलती अफवाहों ने यह भय और गहरा किया कि कम्पनी समाज और धर्म दोनों को बदलना चाहती है। मेरठ से पहले ही चिंगारी बैरकपुर में दिखी, जहाँ मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को अपने अधिकारियों पर आक्रमण किया। व्यापक विस्फोट 10 मई 1857 को मेरठ में हुआ, जब बंदी बनाए गए सिपाहियों को छुड़ाया गया और विद्रोही 11 मई 1857 को दिल्ली पहुँचे। वहीं बहादुर शाह ज़फर को हिंदुस्तान का सम्राट घोषित किया गया, जिससे विद्रोह को वैध शाही प्रतीक मिल गया। दिल्ली विद्रोहियों के शाही केंद्र में बदलते ही घोषणाएँ, राजस्व-संग्रह और पुरानी मुगल वैधता की अपीलें सैनिक विद्रोह को राजनीतिक युद्ध का रूप देने लगीं। यह आंदोलन तेजी से कई केंद्रों में फैल गया: दिल्ली में बख्त खान, कानपुर में नाना साहेब और तात्या टोपे, लखनऊ में बेगम हज़रत महल, झांसी में रानी लक्ष्मीबाई और बिहार में कुंवर सिंह इसके प्रमुख चेहरे बने। फिर भी यह मोर्चा एकसमान नहीं था, क्योंकि कुछ शासक विद्रोह में आए, कुछ प्रतीक्षा करते रहे और अनेक रियासतों ने अपने अस्तित्व के लिए अंग्रेजों का साथ दिया। अंग्रेजी दमन क्रमिक और अत्यंत कठोर था। दिल्ली 20 सितंबर 1857 को पुनः अंग्रेजों के कब्जे में आई; लखनऊ मार्च 1858 में वापस लिया गया; कुंवर सिंह की मृत्यु 9 मई 1858 को हुई; रानी लक्ष्मीबाई 17 जून 1858 को ग्वालियर में वीरगति को प्राप्त हुईं; और तात्या टोपे लंबे गुरिल्ला संघर्ष के बाद 18 अप्रैल 1859 को फांसी पर चढ़ा दिए गए। इस पूरे आंदोलन का संवैधानिक परिणाम भारत शासन अधिनियम 1858 था, जिसने ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन का अंत करके भारत का प्रशासन सीधे क्राउन को सौंप दिया। कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स और बोर्ड ऑफ कंट्रोल समाप्त कर दिए गए, भारत सचिव ब्रिटेन में मुख्य प्राधिकारी बना, उसकी सहायता के लिए 15-सदस्यीय भारत परिषद बनाई गई, और गवर्नर-जनरल को वायसराय की उपाधि मिली। लॉर्ड स्टैनली पहले भारत सचिव बने, जबकि लॉर्ड कैनिंग नई व्यवस्था के अंतर्गत पहले वायसराय रहे। रानी विक्टोरिया की उद्घोषणा 1 नवंबर 1858 को जारी हुई और लॉर्ड कैनिंग ने इसे इलाहाबाद में पढ़ा; इसमें धर्म में हस्तक्षेप न करने, लोक सेवाओं में समान अवसर देने और आगे के विलयों को सामान्य नीति न बनाने का वचन दिया गया। क्राउन ने निष्ठावान रियासतों को बनाए रखने का संकेत भी दिया, क्योंकि विद्रोह ने अनियंत्रित विस्तार की राजनीतिक लागत स्पष्ट कर दी थी। अंग्रेजों के लिए 1858 केवल सत्ता-परिवर्तन नहीं, बल्कि साम्राज्य के पुनर्गठन का क्षण था, जिसमें व्यापारी कम्पनी की जगह अधिक केंद्रीकृत शाही नौकरशाही ने ले ली। राजस्थान इस विद्रोह को एक अलग क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य देता है। राजपूताना की अधिकांश रियासतों ने अंग्रेजों का साथ दिया, फिर भी मारवाड़ के आउवा में ठाकुर कुषाल सिंह के नेतृत्व में तीखा प्रतिरोध उभरा, और कोटा के विद्रोह में 15 अक्टूबर 1857 को मेजर बर्टन मारा गया। अंतिम चरण में तात्या टोपे की गतिविधियाँ सिरोंज-बांसवाड़ा-प्रतापगढ़-उदयपुर क्षेत्र तक पहुँचीं, और 7 अप्रैल 1859 को पैरों में उसकी गिरफ्तारी ने दिखाया कि विद्रोह का अंतिम प्रभाव राजस्थान की सीमा-रेखा तक फैला हुआ था।
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित
1 MCQ निम्न घटनाओं को सही कालक्रम में व्यवस्थित कीजिए: बैरकपुर में अपने अधिकारियों पर आक्रमण करने वाले सिपाही का दंड, मेरठ में विद्रोह का विस्फोट, दिल्ली पर अंग्रेजों का पुनः अधिकार, और क्राउन अधिग्रहण के बाद जारी शाही उद्घोषणा।
व्याख्या
विकल्प क सही है क्योंकि इस क्रम को 4 निश्चित तिथियाँ तय करती हैं। कारतूस-विवाद की पृष्ठभूमि में मंगल पांडे को बैरकपुर में 8 अप्रैल 1857 को फांसी दी गई, इसके बाद 10 मई 1857 को मेरठ में विद्रोह फूटा, फिर 20 सितंबर 1857 को अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः अधिकार किया, और उससे भी बाद में क्राउन अधिग्रहण के बाद 1 नवंबर 1858 को रानी विक्टोरिया की उद्घोषणा जारी हुई। विकल्प ख गलत है क्योंकि वह मेरठ को बैरकपुर की घटना से पहले रखता है। विकल्प ग गलत है क्योंकि मेरठ के विस्फोट के बिना दिल्ली की पुनः प्राप्ति का प्रसंग ही नहीं बनता। विकल्प घ गलत है क्योंकि उद्घोषणा विद्रोह के प्रमुख सैन्य दमन के बाद आई थी, दिल्ली की पुनः प्राप्ति से पहले नहीं।
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