मूल श्रमण पृष्ठभूमि: नगर, बहस और नए मार्ग
बौद्ध, जैन और आजीवक धार्मिक आंदोलन ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी के मध्य के व्यापक श्रमण संसार से जुड़े थे। गंगा-घाटी के नगर, आहत सिक्के, व्यापारिक मार्ग, गहपति गृहस्थ और नए महाजनपद ऐसे श्रोता पैदा कर रहे थे जो केवल वंशानुगत यज्ञ-विशेषज्ञों पर निर्भर नहीं थे। ऋग्वैदिक यज्ञ महत्वपूर्ण रहा, पर अनेक भ्रमणशील आचार्यों ने पूछा कि जन्म, कर्मकांड और पुरोहित-मध्यस्थता दुख, पुनर्जन्म और मुक्ति को पूरी तरह कैसे समझा सकती है। बौद्ध ग्रंथों में अनेक वाद-विवाद समूह मिलते हैं; एनसीईआरटी में 64 संप्रदायों या विचार-शालाओं का संकेत है। इसी घने परिवेश में महावीर और गौतम बुद्ध ने वैदिक अधिकार को चुनौती दी, अनुशासित आचरण पर बल दिया और अनेक सामाजिक समूहों के लिए संघीय मार्ग खोले। आजीवक भी इसी भ्रमणशील और विवाद-प्रधान संसार में थे, पर उन्होंने बंधन को नैतिक प्रयास की जगह नियति से समझाया। राजस्थान इस मानचित्र से बाहर नहीं है। जयपुर के निकट बैराट या प्राचीन विराटनगर, मत्स्यदेश की राजधानी, अशोक अभिलेखों और मौर्यकालीन बौद्ध अवशेषों को सुरक्षित रखता है; यह स्थल दिखाता है कि बौद्ध धर्म प्रारंभिक ऐतिहासिक सांस्कृतिक क्षेत्र के उत्तर-पश्चिमी किनारे तक पहुँचा। इसलिए विषय जीवनी से पहले समाज से शुरू होता है: नगरीय परिवर्तन ने आश्रयदाता दिए, राजदरबारों ने संरक्षण दिया, व्यापारियों ने दान दिया और विहारों ने स्थायी संस्था दी। बौद्ध, जैन और आजीवक विचार एक ही दबाव के अलग उत्तर थे: जब कर्मकांडीय जन्म-क्रम पूरे नैतिक जगत को नहीं समझाता, तब मनुष्य को कैसे जीना चाहिए।
