मूल बाबर, प्रथम पानीपत 1526 और मुग़ल साम्राज्य की स्थापना
ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर (मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक) का जन्म 14 फरवरी 1483 को अंदीजान में हुआ और उसने 1494 में 12 वर्ष की आयु में फरगना का उत्तराधिकार पाया। पिता की ओर से उसका वंश उमर शेख मिर्जा के माध्यम से तैमूर से और माता की ओर से यूनुस खान के माध्यम से चंगेज़ खान से जुड़ता था। इस तैमूरी-चंगेज़ी विरासत ने बाबर को मध्य एशियाई सार्वभौम दावे की प्रतिष्ठा दी, पर उससे स्थिर सत्ता नहीं मिली। समरकंद के लिए बार-बार के संघर्ष विफल रहे और उसके जीवन का निर्णायक मोड़ 1504 में आया, जब उसने काबुल पर अधिकार किया। काबुल ने उसे सुरक्षित आधार, पंजाब की राह और वही सैनिक गहराई दी, जिससे आगे चलकर भारत में मुग़ल सत्ता की स्थापना संभव हुई।
भारत में बाबर की सफलता केवल अवसर का परिणाम नहीं थी, बल्कि उसकी युद्ध-पद्धति भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण थी। 21 अप्रैल 1526 को पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ, जहाँ उसने दिल्ली के उत्तर में इब्राहीम लोदी का सामना लगभग 12,000 सैनिकों से किया, जबकि प्रतिपक्ष को सामान्यतः 100,000 सैनिक और 1,000 हाथियों वाला बल माना जाता है। बाबर ने उस्ताद अली कुली के नेतृत्व में बारूदी बंदूकों और मैदानी तोपखाने का उपयोग किया, जबकि तुलगमा ने शत्रु के किनारों पर घूमकर दबाव बनाया। इब्राहीम लोदी युद्धभूमि में मारा गया, लोदी सल्तनत का अंत हुआ और दिल्ली-आगरा बाबर के अधिकार में आ गए। वह अभी पूरे भारत का स्वामी नहीं बना था, पर अब उसके पास वही राजनीतिक केंद्र था जहाँ से राजस्व, राजसत्ता के प्रतीक और आगे के अभियान व्यवस्थित किए जा सकते थे। इसलिए 1526 का पानीपत केवल वंश परिवर्तन नहीं था, बल्कि उत्तर भारत में तोपखाने से समर्थित खुली मैदानी युद्धकला की निर्णायक स्थापना भी था।
पानीपत की विजय के बाद भी विरोध समाप्त नहीं हुआ। 17 मार्च 1527 को बाबर ने खनवा में मेवाड़ के राणा साँगा का सामना किया और यही प्रसंग राजस्थान के लिए विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि यहीं से मुग़ल-मेवाड़ संबंधों का दीर्घ राजनीतिक क्रम स्पष्ट होता है। साँगा के परिसंघ में हसन खान मेवाती और महमूद लोदी भी शामिल थे, इसलिए यह हिंदुस्तान में बाबर के विरुद्ध सबसे सशक्त राजपूत चुनौती थी। अभियान से पहले बाबर ने मदिरा-त्याग की घोषणा की, संघर्ष को जिहाद का रूप दिया और तमगा समाप्त किया, ताकि अपने शिविर में अनुशासन और निष्ठा को मजबूत कर सके। युद्ध में फिर तोपखाना, रक्षात्मक व्यवस्था और तुलगमा साथ काम आए। राणा साँगा घायल होकर हटे और 1528 में उनकी मृत्यु हो गई। खनवा ने राजपूत शक्ति को समाप्त नहीं किया, पर उसने दिल्ली-आगरा के केंद्र से बाबर को हटाने की मेवाड़-नेतृत्व वाली संभावना को अवरुद्ध कर दिया।
खनवा के बाद बाबर ने अपने अधिकार की शेष कमजोरियों पर आघात किया। 1528 में उसने मेदिनी राय से चंदेरी छीनी; इस विजय के साथ जुड़ा जौहर उस संघर्ष की तीव्रता को दिखाता है। 1529 में घाघरा पर उसने महमूद लोदी और बंगाल के नुसरत शाह से जुड़े अफ़ग़ान-बंगाल संयोजन का सामना किया। 1529 के अंत तक बाबर ने गंगीय मैदान में अफ़ग़ान चुनौती को काफी हद तक दबा दिया और काबुल से बिहार तक फैली सत्ता पर नियंत्रण स्थापित किया, यद्यपि बंगाल अभी उसके प्रत्यक्ष अधिकार में नहीं आया था। 26 दिसंबर 1530 को आगरा में उसकी मृत्यु हुई और 1530 में हुमायूँ उसका उत्तराधिकारी बना। पानीपत, खनवा, चंदेरी और घाघरा का यह क्रम बताता है कि बाबर का शासन किसी एक आकस्मिक विजय से नहीं बना था।
बाबरनामा बाबर के जीवन को समझने का सबसे निकटस्थ स्रोत है। यह चग़ताई तुर्की में लिखा गया और अकबर के समय अब्दुर रहीम खान-ए-खाना ने इसका फ़ारसी अनुवाद कराया। इसमें युद्धों के साथ नदियों, बाग़ों, फलों, नगरों और हिंदुस्तान की जलवायु पर भी प्रत्यक्ष टिप्पणियाँ मिलती हैं, इसलिए यह केवल दरबारी आख्यान नहीं है। बाद में उसकी इच्छा के अनुसार उसके अवशेष काबुल के बाग़-ए-बाबर में रखे गए। राजस्थान के अध्ययन में मुख्य बात यह है कि भारत में बाबर की पहली बड़ी साम्राज्यिक स्थापना का सबसे कठोर परीक्षण मेवाड़ के राणा साँगा के विरुद्ध हुआ, इसलिए खनवा मुग़ल विस्तार और राजपूत राज्यकला के मिलन-बिंदु के रूप में याद किया जाता है।
