मूल सल्तनती आरंभ: क़ुतुब परिसर और अलाई दरवाज़ा
क़ुतुब परिसर मध्यकालीन स्थापत्य के प्रश्नों का आरंभिक आधार है, क्योंकि एक ही स्थान में विजय, अनुकूलन और तकनीकी प्रयोग दिखते हैं। क़ुतुब मीनार (ऐबक एवं इल्तुतमिश) दिल्ली की ग़ुरी विजय के बाद शुरू हुई; ऐबक ने मीनार आरंभ की और इल्तुतमिश ने प्रमुख मंजिलें जोड़ीं, इसलिए यह स्मारक स्थापना और सुदृढ़ीकरण दोनों दर्ज करता है। पास की क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद में पहले की मंदिर सामग्री का पुनःप्रयोग हुआ, जिससे आरंभिक सल्तनती भाषा मिश्रित दिखती है: बीम और कार्बेल रूप इस्लामी लेखन तथा मीनार प्रतीक के साथ खड़े हैं। अलाई दरवाज़ा (अलाउद्दीन खिलजी), 1311 में पूरा हुआ, अधिक स्पष्ट तकनीकी चिह्न है। इसमें लाल बलुआ पत्थर, सफेद संगमरमर जड़ाई, सच्चा गुम्बद, नुकीली मेहराब और ज्यामितीय सतह नियंत्रण है। इसी कारण यह आरंभिक प्रयोग से अधिक परिपक्व हिंद-इस्लामी स्थापत्य की ओर बदलाव दिखाता है। राजस्थान इस दिल्ली कथा से बाहर नहीं है। अजमेर और सांभर ने चाहमान संसार को दिल्ली राजनीति से जोड़ा, और दिल्ली-अजमेर-गुजरात मार्ग ने पश्चिमी भारत को सल्तनती शक्ति के लिए जरूरी बनाया। स्थापत्य रेखा इसलिए अजमेर, रणथंभौर और मेवाड़ की पृष्ठभूमि से भी जुड़ी रहती है। क़ुतुब मीनार आरंभिक तुर्क सत्ता का प्रतीक है; अलाई दरवाज़ा मंगोल-रक्षा और राजस्व विस्तार के बाद खिलजी आत्मविश्वास का प्रवेशद्वार है। दोनों को मिलाना गलत होगा।
