मूल वैदिक ग्रंथ-संग्रह और तर्क-पद्धतियां
श्रुति / स्मृति परंपरा एवं षड् दर्शन भारतीय ज्ञान-प्रणाली की आरंभिक संरचना बनाते हैं। श्रुति में 4 वेद, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद आते हैं, जिन्हें सुना और स्मरण रखा गया। स्मृति में धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण, विधि, अनुष्ठान-ग्रंथ और टीकाएं आती हैं। उपनिषदों की संख्या प्रायः 108 मानी जाती है और वेदांत में 13 प्रमुख उपनिषद अधिक उपयोग में आते हैं। इस ग्रंथ-संग्रह में ज्ञान केवल सूचना नहीं है; वह वाणी की शुद्धता, गुरु-शिष्य परंपरा, वाद-विवाद, कर्तव्य और आत्मबोध से जुड़ता है। षड् दर्शन 6 ज्ञान-पद्धतियां हैं। न्याय में गौतम तर्क और प्रमाण की चर्चा करते हैं। वैशेषिक में कणाद द्रव्य, गुण और कर्म जैसी श्रेणियां रखते हैं। सांख्य में कपिल पुरुष और प्रकृति को अलग करते हैं। योग में पतंजलि मन और अभ्यास को अनुशासित करते हैं। पूर्व मीमांसा में जैमिनि वैदिक कर्म की व्याख्या करते हैं। उत्तर मीमांसा या वेदांत में बादरायण उपनिषदों के ब्रह्म-विचार को व्यवस्थित करते हैं। राजस्थान का संबंध वर्तमान जालोर जिले के भिल्लमाल से आता है, जहां ब्रह्मगुप्त ने 628 ईस्वी में ब्रह्मस्फुटसिद्धांत लिखा। यह गणित और खगोल का ग्रंथ है, फिर भी वह दिखाता है कि पश्चिमी भारत में संस्कृत विद्या, गणना, ब्रह्मांड-विचार और टीका-परंपरा आपस में जुड़ी रहीं।
