मूल तमिल भक्ति: अलवार और नयनार
अलवार (12 वैष्णव) एवं नयनार (63 शैव) — तमिल भक्ति बाद की भक्ति परंपरा का प्रारंभिक मजबूत आधार है। 7वीं से 9वीं शताब्दी में शिव-भक्त नयनार और विष्णु-भक्त अलवार तमिल क्षेत्र के तीर्थों में घूमे, गीत रचे और भक्ति को जाति-आधारित कर्मकांड से ऊपर रखा। प्रसिद्ध नयनारों में अप्पर, संबंदर, सुंदरर और माणिक्कवाचकर आते हैं; उनके गीत तेवारम् और तिरुवाचकम् सहित तिरुमुरै परंपरा में सुरक्षित हैं। अलवारों में पेरियालवार, आंडाल, तोंडराडिप्पोडि अलवार और नम्मालवार प्रमुख हैं; उनके गीत दिव्य प्रबंधम् में संकलित हुए। आंडाल मानक सूची में एकमात्र महिला अलवार हैं, इसलिए वैष्णव भक्ति में उनका स्थान अलग है। 10वीं से 12वीं शताब्दी में चोल और पांड्य मंदिर-निर्माण ने तीर्थ, गीत और राजकीय संरक्षण को जोड़ा। राजस्थान का संबंध बाद के समानांतर से दिखता है: मेड़ता-मेवाड़ की मीरा बाई ने कृष्ण को प्रियतम मानकर लोकभाषा में पद गाए। नाथद्वारा, राजसमंद बाद में पुष्टिमार्ग का बड़ा कृष्ण केंद्र बना, जिससे दक्षिण और पश्चिम की वैष्णव धाराएँ तीर्थ और छवि के माध्यम से जुड़ती हैं। इन समूहों की सामाजिक संरचना भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है: नयनार स्मृति में कुम्हार, किसान, शिकारी, सैनिक, ब्राह्मण और प्रमुख मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि आरंभिक भक्ति में तीर्थ, भाषा, संगीत और समुदाय साथ-साथ काम कर रहे थे। ये गीत इतिहास-स्रोत भी हैं, क्योंकि वे स्थान, मंदिर-मार्ग, सामाजिक स्मृति और धार्मिक प्रतिद्वंद्विता को बचाकर रखते हैं।
