256. भक्ति एवं सूफी आंदोलन
Bhakti & Sufi Movementsमूल मुख्य बिंदु
- 1
तमिल भक्ति में अलवार और नयनार आरंभिक आधार हैं; उनके गीत बाद में दिव्य प्रबंधम्, तेवारम् और तिरुवाचकम् जैसे संकलनों में सुरक्षित हुए।
- 2
शंकर, रामानुज, मध्वाचार्य और वल्लभाचार्य चार दार्शनिक आधार देते हैं: अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत और शुद्धाद्वैत-पुष्टिमार्ग।
- 3
रामानंद ने बनारस से वैष्णव भक्ति को उत्तर भारत में फैलाया; कबीर और गुरु नानक ने निर्गुण एकेश्वरवाद को कर्मकांड-विरोध से जोड़ा।
- 4
मेड़ता-मेवाड़ की राजपूत पृष्ठभूमि वाली मीरा बाई ने कृष्ण भक्ति को राजस्थान की सार्वजनिक स्मृति में गहरा स्थान दिया।
- 5
तुलसीदास, सूरदास, चैतन्य, शंकरदेव और मराठी वारकरी संत क्षेत्रीय भाषाओं में भक्ति के विस्तार को दिखाते हैं।
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सूफी अध्ययन में सिलसिला-मानचित्र निर्णायक है: अजमेर-दिल्ली में चिश्ती, उत्तर-पश्चिम में सुहरावर्दी, पंजाब-मुगल क्षेत्र में क़ादरी और बाद में नक़्शबंदी।
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अजमेर शरीफ राजस्थान को चिश्ती परंपरा से जोड़ता है, जबकि निज़ामुद्दीन औलिया और अमीर खुसरो सूफी आध्यात्मिकता को संगीत तथा हिंदवी भाषा से जोड़ते हैं।
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साझा सूत्र सिद्धांतों की समानता नहीं, बल्कि लोकभाषा, गुरु-शिष्य परंपरा, जन्म-स्थिति से ऊपर भक्ति और तीर्थ-समुदायों का विस्तार है।
मूल तमिल भक्ति: अलवार और नयनार
अलवार (12 वैष्णव) एवं नयनार (63 शैव) — तमिल भक्ति बाद की भक्ति परंपरा का प्रारंभिक मजबूत आधार है। 7वीं से 9वीं शताब्दी में शिव-भक्त नयनार और विष्णु-भक्त अलवार तमिल क्षेत्र के तीर्थों में घूमे, गीत रचे और भक्ति को जाति-आधारित कर्मकांड से ऊपर रखा। प्रसिद्ध नयनारों में अप्पर, संबंदर, सुंदरर और माणिक्कवाचकर आते हैं; उनके गीत तेवारम् और तिरुवाचकम् सहित तिरुमुरै परंपरा में सुरक्षित हैं। अलवारों में पेरियालवार, आंडाल, तोंडराडिप्पोडि अलवार और नम्मालवार प्रमुख हैं; उनके गीत दिव्य प्रबंधम् में संकलित हुए। आंडाल मानक सूची में एकमात्र महिला अलवार हैं, इसलिए वैष्णव भक्ति में उनका स्थान अलग है। 10वीं से 12वीं शताब्दी में चोल और पांड्य मंदिर-निर्माण ने तीर्थ, गीत और राजकीय संरक्षण को जोड़ा। राजस्थान का संबंध बाद के समानांतर से दिखता है: मेड़ता-मेवाड़ की मीरा बाई ने कृष्ण को प्रियतम मानकर लोकभाषा में पद गाए। नाथद्वारा, राजसमंद बाद में पुष्टिमार्ग का बड़ा कृष्ण केंद्र बना, जिससे दक्षिण और पश्चिम की वैष्णव धाराएँ तीर्थ और छवि के माध्यम से जुड़ती हैं। इन समूहों की सामाजिक संरचना भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है: नयनार स्मृति में कुम्हार, किसान, शिकारी, सैनिक, ब्राह्मण और प्रमुख मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि आरंभिक भक्ति में तीर्थ, भाषा, संगीत और समुदाय साथ-साथ काम कर रहे थे। ये गीत इतिहास-स्रोत भी हैं, क्योंकि वे स्थान, मंदिर-मार्ग, सामाजिक स्मृति और धार्मिक प्रतिद्वंद्विता को बचाकर रखते हैं।
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संभावित संभावित RAS प्रश्न
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1 MCQ आरंभिक तमिल भक्त समूहों को उनके संप्रदायिक केंद्र और पाठ-स्मृति से मिलाइए।
व्याख्या
अलवार वैष्णव तमिल संत हैं और उनके गीत दिव्य प्रबंधम् में संकलित हैं। नयनार शैव संत हैं, इसलिए ख और ग में देवता उलट गए हैं; सूरसागर सूरदास तथा ब्रज कृष्ण-काव्य से जुड़ा है, तमिल शैव परंपरा से नहीं।
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