मूल सिंधु घाटी कला एवं पूर्व-मौर्य भौतिक आधार
3300 से 1300 ईसा पूर्व के बीच, और विशेषकर 2600-1900 ईसा पूर्व के परिपक्व हड़प्पाई चरण में, उत्तर-पश्चिमी उपमहाद्वीप ने ऐसी नगरीय भौतिक संस्कृति विकसित की जिसमें कांस्य ढलाई, टेराकोटा प्रतिमाएं, स्टेटाइट नक्काशी, स्वर्ण-शंख आभूषण, मानकीकृत मुहरें, बाट और ईंटें एक संयुक्त शिल्प अनुशासन दिखाती हैं। मोहनजोदड़ो की नर्तकी इस संसार की सबसे सजीव वस्तु है: लगभग 2500 ईसा पूर्व की 10.5 सेमी ऊंची कांस्य प्रतिमा, जो लुप्त-मोम विधि से ढली और आज नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है। इसके साथ 17.5 सेमी ऊंचा स्टेटाइट का पुरोहित-राजा बस्ट भी महत्वपूर्ण है, जिसकी तिपतिया अलंकरण वाली चादर हड़प्पाई उच्चवर्गीय अभिरुचि का संकेत देती है। इन वस्तुओं का महत्व केवल संग्रहालयीय दुर्लभता में नहीं, बल्कि इस तथ्य में है कि इन्हीं के पीछे 1, 2, 4, 8, 16 अनुपात वाले मानकीकृत घनाकार चर्ट बाट और 1:2:4 अनुपात में प्रयुक्त पकी ईंटों वाला एक सुव्यवस्थित शहरी संसार मौजूद था। यही संगठनात्मक अनुशासन मुहरों की दुनिया में भी दिखता है। पशुपति मुहर, 4000 से अधिक प्रकाशित सिंधु मुहरों में से एक, बीच में सींगधारी आकृति और उसके चारों ओर हाथी, बाघ, गैंडा तथा भैंसे को दिखाती है। जॉन मार्शल ने 1931 में इसे आद्य-शिव रूप में पढ़ा, पर बाद के विद्वानों ने शामनिक अथवा भैंसा-केंद्रित व्याख्याएं भी दी हैं; इसलिए इसे स्थिर धर्मसिद्धांत की बजाय जटिल प्रतीक-भाषा के प्रमाण के रूप में पढ़ना अधिक सुरक्षित है। तकनीकी तथ्य अधिक स्पष्ट हैं: अधिकांश मुहरें स्टेटाइट की हैं, लिपि अब भी अपठित है और लगभग 400 चिह्नों का समूह माना जाता है, जबकि एक-सींग वाले पशु और आगे रखी पात्र-जैसी आकृति वाला रूपांक सबसे अधिक मिलता है। ये मुहरें, मनके, शंख आभूषण और मानकीकृत माप यह भी बताते हैं कि हड़प्पाई नगरों के बीच लंबी दूरी का विनिमय था और अलग-अलग कार्यशालाएं साझा मानकों के भीतर काम कर सकती थीं। इसी कारण सूक्ष्म मनका-छिद्रण, फैयांस परिष्कार और धातु ढलाई को बाद की भारतीय शिल्प परंपराओं की तकनीकी पूर्वपीठिका की तरह पढ़ना चाहिए। टेराकोटा खिलौने, चूड़ियां और घरेलू पात्र यह भी दिखाते हैं कि हड़प्पाई कला केवल अभिजात वस्तुओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में भी रूप और शिल्प की पुनरावृत्ति मौजूद थी। राजस्थान इस प्राचीन परिदृश्य में सीधे कालीबंगा (हनुमानगढ़, राजस्थान) के माध्यम से प्रवेश करता है। 1960 से 1969 तक बी.बी. लाल और उनके सहयोगियों के उत्खनन से यहां लगभग 2800 ईसा पूर्व का पूर्व-हड़प्पाई जुता हुआ खेत, अनुष्ठानिक मंचों पर अग्नि-वेदिकाएं और छोटी स्टेटाइट मुहरें मिलीं। जुता हुआ खेत विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां कृषि केवल अनुमान नहीं बल्कि प्रत्यक्ष पुरातात्विक साक्ष्य बन जाती है, जबकि अग्नि-वेदिकाएं नगर जीवन में अनुष्ठान की भूमिका पर बहस को जीवित रखती हैं। लोथल गुजरात में ज्वारीय गोदी का उदाहरण देता है और धोलावीरा कच्छ में पत्थर-बद्ध जलाशयों का, लेकिन कालीबंगा आरएएस अभ्यर्थी के लिए ऐसा स्थानीय पुरातात्विक आधार देता है जो घग्घर क्षेत्र को व्यापक हड़प्पाई नगरीय नेटवर्क से जोड़ता है। पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व में यह परंपरा शून्य में नहीं बदलती। लगभग 1200-600 ईसा पूर्व के संदर्भों मेंचित्रित धूसर मृद्भांड मिलता है, और उत्तरी काला पॉलिश युक्त मृद्भांड लगभग 700-200 ईसा पूर्व के बीच प्रारंभिक नगरीकरण से जुड़ा अत्यंत चमकीला विलासी मृद्भांड बनकर उभरता है। इसका हस्तिनापुर, कौशांबी, राजघाट, अतरंजीखेड़ा और बैराठ (विराटनगर, जयपुर) तक फैलाव दिखाता है कि उत्तर भारतीय शिल्प-जगत मौर्यकालीन पत्थर-चमक से बहुत पहले ही पुनर्संगठित हो रहा था। राजस्थान का यह सूत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि बाद में बैराठ में अशोक का भाब्रू शिलालेख मिलता है। इस क्रम में देखें तो हड़प्पाई कांस्य, मुहर-निर्माण, बाट, ईंट-अनुपात, कालीबंगा की कृषि और उत्तरी काला पॉलिश युक्त मृद्भांड की चमक आगे चलकर सारनाथ सिंह शीर्ष और मेहरौली लौह स्तंभ जैसी उपलब्धियों के नीचे मौजूद भौतिक आधार तैयार करती है; अशोककालीन शिल्पियों ने शून्य से शुरुआत नहीं की थी।
