मूल संकट, सुधार और 1991 का मोड़
उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण (एलपीजी) सुधार 1991 सामान्य नीति-समीक्षा से नहीं, भुगतान-संतुलन संकट से निकले। 1991 के मध्य तक विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम आयात अवधि को ढकता था, महंगाई तेज थी, बाहरी ऋणदाता सतर्क थे और आयात-संपीड़न से औद्योगिक उत्पादन दबा हुआ था। इसलिए सुधारों ने चार जुड़ी बाधाओं पर चोट की: क्षमता पर लाइसेंसिंग, ऊंचा आयात संरक्षण, कई क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र का प्रभुत्व और विदेशी निवेश पर कड़े नियंत्रण। डॉ. मनमोहन सिंह के 1991-92 बजट भाषण में व्यापार नीति और औद्योगिक नीति को साथ रखा गया, क्योंकि भारतीय उद्योग को आयातित इनपुट, तकनीक और निर्यात बाजार चाहिए थे। पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने इस बदलाव को राजनीतिक आधार दिया। औद्योगिक विकास के लिए बड़ा परिवर्तन यह था कि कंपनियां प्रशासनिक अनुमति पर निर्भर रहने के बजाय मूल्य और तकनीक की प्रतिस्पर्धा में आईं। निजीकरण उदारीकरण से अधिक सावधान रहा; भारत ने विनिवेश, आरक्षित क्षेत्रों में कमी और बाद में रणनीतिक बिक्री अपनाई। राजस्थान में इसका अर्थ व्यावहारिक था। भिवाड़ी, नीमराणा, जयपुर, जोधपुर, कोटा और भीलवाड़ा के रीको औद्योगिक क्षेत्र तभी अधिक निवेश खींच सकते थे जब राष्ट्रीय नीति पैमाना, विदेशी सहयोग और मशीनरी आयात को आसान करे। 1991 ने भूमि, बिजली, परिवहन या ऋण की समस्या समाप्त नहीं की, पर निजी उद्योग के विस्तार को वैध आर्थिक दिशा बना दिया। सुधारों का क्रम भी महत्त्वपूर्ण था: पहले बाहरी विश्वास, फिर व्यापार-खोलना, फिर औद्योगिक प्रवेश और बाद में वित्तीय सुधार।
