मूल राजकोषीय संघवाद का संवैधानिक ढाँचा
राजकोषीय संघवाद वह नियम-समूह है जिससे संघ, राज्य और स्थानीय निकाय राजस्व जुटाते, कर बाँटते और सार्वजनिक सेवाओं को वित्त देते हैं। अनुच्छेद 265 — कर विधि के प्राधिकार से ही लगाए जा सकते हैं — पहली सीमा तय करता है: संघ या राज्य विधिक प्राधिकार के बिना कर नहीं लगा और वसूल सकता। अनुच्छेद 270 — संघ करों के निवल आगमों का वितरण — विभाज्य पूल की धारणा बनाता है, क्योंकि कुछ संघ कर संघ और राज्यों में बाँटे जाते हैं, जबकि उपकर और अधिभार संवैधानिक रूप से अलग रहते हैं। अनुच्छेद 275 — संघ से राज्यों को सहायता अनुदान — भारत की संचित निधि से ऐसे राज्यों के लिए वैधानिक अनुदान देता है जिन्हें सहायता चाहिए। अनुच्छेद 280 — वित्त आयोग — इन धाराओं को जोड़ता है: राष्ट्रपति हर पाँचवें वर्ष या पहले वित्त आयोग बनाता है, जिसमें अध्यक्ष और 4 सदस्य होते हैं, ताकि ऊर्ध्वाधर बँटवारा, क्षैतिज हिस्से, सहायता अनुदान और पंचायतों-नगरपालिकाओं के लिए राज्य निधि बढ़ाने के उपाय सुझाए जा सकें। राजस्थान इस ढाँचे में दो स्तरों पर आता है: कर बँटवारा और अनुदान पाने वाले राज्य के रूप में, और 73वें तथा 74वें संविधान संशोधनों के बाद अपने पंचायतों तथा नगरीय निकायों के माध्यम से, जिनके संसाधन वित्त आयोग सिफारिशों से जुड़ते हैं। इसलिए कोई बजट संख्या अपने आप संघीय धन नहीं बनती। कर को पहले विधि का प्राधिकार चाहिए, फिर वह विभाज्य पूल में आता या बाहर रहता है, फिर वित्त आयोग सिफारिश या अनुदान बनता है। इसी कारण आयकर, जीएसटी, क्षतिपूर्ति उपकर और स्थानीय निकाय अनुदान राजस्थान के जिले या नगरपालिका तक अलग-अलग संवैधानिक रास्तों से पहुँचते हैं।
