मूल राज्यों का संघ और क्षेत्रीय शक्ति
अनुच्छेद 1 भारत को राज्यों का संघ कहता है। इसका अर्थ है कि संघ संविधान से बना है और किसी राज्य को अलग होने का स्वतंत्र अधिकार नहीं है। क्षेत्रीय शक्ति मुख्य रूप से अनुच्छेद 3 में है: संसद नया राज्य बना सकती है, सीमा बदल सकती है, नाम बदल सकती है या क्षेत्र घटा-बढ़ा सकती है, पर राष्ट्रपति पहले प्रस्ताव संबंधित राज्य विधानमंडल को मत देने के लिए भेजता है। 1963 में पश्चिम बंगाल राज्य बनाम भारत संघ ने स्पष्ट किया कि राज्य संघ के बराबर संप्रभु इकाई नहीं है। 1960 के बेरुबारी संघ संदर्भ ने अलग सीमा रखी: भारतीय क्षेत्र किसी विदेशी राज्य को देने के लिए केवल कार्यपालिका समझौता काफी नहीं, संविधान संशोधन चाहिए। संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 ने भाग क, भाग ख और भाग ग श्रेणियों को हटाकर आधुनिक राज्य संरचना मजबूत की। राजस्थान इस ढांचे से सीधे जुड़ता है। रियासती संघों से बना राजस्थान 1956 से पहले एकीकृत हो चुका था, लेकिन संविधान में राजस्थान की स्थिति अनुच्छेद 1 और प्रथम अनुसूची से आती है। अनुच्छेद 3 आज भी राज्य क्षेत्र या नाम बदलने पर काम आता है। ढांचा परामर्श का है, वीटो का नहीं: राज्य विधानमंडल सुना जाता है, अंतिम कानून संसद बनाती है। इसी से स्पष्ट है कि सीमा जिला, राज्य का नया नाम या क्षेत्र विनिमय संप्रभु भागीदारों का सौदा नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया है जिसमें राज्य का मत सुना जाता है और राष्ट्रीय क्षेत्रीय निरंतरता संघ की जिम्मेदारी रहती है।
