मूल संवैधानिक ढांचा
राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत भाग 4, अनुच्छेद 36 से 51 में हैं, जबकि मूल कर्तव्य भाग 4-क में अनुच्छेद 51क के माध्यम से आते हैं। अनुच्छेद 37 इस रचना का मुख्य नियम देता है। नीति निदेशक सिद्धांत किसी न्यायालय से लागू नहीं कराए जा सकते, फिर भी वे देश के शासन में मूलभूत हैं और कानून बनाते समय राज्य पर उन्हें लागू करने का दायित्व है। इससे लक्ष्यों की संवैधानिक भाषा बनती है, निजी दावों का अलग लागू संहिता नहीं। अनुच्छेद 39(ख) और 39(ग) भौतिक संसाधनों तथा धन-संकेंद्रण के प्रश्न को सामान्य हित की ओर मोड़ते हैं और हानिकारक संकेंद्रण के विरुद्ध आर्थिक नीति का आधार देते हैं। अनुच्छेद 39क समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता जोड़ता है। अनुच्छेद 48क राज्य पर पर्यावरण संबंधी दायित्व रखता है, और अनुच्छेद 51क(छ) उसी दायित्व का नागरिक-पक्ष दिखाता है। राजस्थान में ये प्रावधान अमूर्त पाठ की तरह नहीं, ठोस स्थितियों में दिखते हैं। विधिक सहायता क्लीनिक अनुच्छेद 39क से जुड़े हैं। राजस्थान में शिक्षा का अधिकार लागू होने पर अनुच्छेद 21क स्कूल-शासन का रूप लेता है। अरावली संरक्षण को राजस्थान के पर्यावरण दायित्व की दृष्टि से पढ़ें तो वह अनुच्छेद 48क और 51क(छ) से जुड़ता है। इस विषय की 2 परतें हैं। पहली अनुच्छेद-मानचित्रण है: 39क विधिक सहायता के लिए, 43ख सहकारी समितियों के लिए, 48क पर्यावरण के लिए और 51क(ग) संप्रभुता तथा अखंडता के लिए। दूसरी संवैधानिक पद्धति है। अदालतें सामान्यतः नीति निदेशक सिद्धांतों के पालन को अकेले उपाय के रूप में आदेशित नहीं कर सकतीं, पर वे अधिकारों की व्याख्या, कल्याणकारी कानूनों की परीक्षा और भाग 3 तथा भाग 4 के बीच सामंजस्य बनाए रखने में उनका उपयोग कर सकती हैं। अनुच्छेद संख्या को संस्थागत काम से जोड़कर पढ़ना चाहिए। भाग 4 मुख्यतः विधायिका और कार्यपालिका से बात करता है। भाग 4-क नागरिक आचरण और लोक-शिक्षा को आकार देता है। यही विभाजन समझाता है कि राजस्थान का कोई विद्यालय नियम, विधिक सहायता कार्यक्रम और अरावली से जुड़ा आदेश अलग-अलग अनुच्छेदों के संवैधानिक उत्तर हो सकते हैं, भले उनका उपाय समान न हो। श्रेणी-स्पष्टता अनुच्छेदों की गड़बड़ी रोकती है।
