मूल निकाय-प्रकार और अधिकार का स्रोत
संवैधानिक निकाय वह है जिसका कार्यालय, नियुक्ति मार्ग या मूल कार्य संविधान में ही दिया गया हो। सांविधिक निकाय किसी अधिनियम से बनता है और उस अधिनियम में संशोधन से बदला जा सकता है, बशर्ते संवैधानिक सीमाएं न टूटें। अनुच्छेद 324 का निर्वाचन आयोग, अनुच्छेद 148 का नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक, अनुच्छेद 280 का वित्त आयोग, अनुच्छेद 315 से 323 के लोक सेवा आयोग, अनुच्छेद 243K के राज्य निर्वाचन आयोग और अनुच्छेद 279A की वस्तु एवं सेवा कर परिषद संवैधानिक संस्थाएं हैं। केंद्रीय सतर्कता आयोग, केंद्रीय सूचना आयोग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राज्य मानवाधिकार आयोग, लोकपाल और अनेक अधिकरण सांविधिक संस्थाएं हैं। फर्क प्रतिष्ठा का नहीं, कानूनी स्रोत, हटाने की सुरक्षा, प्रतिवेदन-रेखा और न्यायिक पुनरावलोकन का है। राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग और राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग इसी भेद को राज्य स्तर पर दिखाते हैं। निर्माण-स्रोत संशोधन की सीमा भी तय करता है। संसद साधारण अधिनियम से नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक या अनुच्छेद 324 को समाप्त नहीं कर सकती, पर संवैधानिक सीमाओं के भीतर केंद्रीय सूचना आयोग के लिए सूचना अधिनियम या केंद्रीय सतर्कता आयोग के लिए केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम बदल सकती है। प्रतिवेदन भी अलग होता है: नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक रिपोर्ट विधानमंडलों के सामने रखी जाती है, वित्त आयोग की अनुशंसाएं राष्ट्रपति को जाती हैं और सांविधिक आयोग अपने अधिनियम में दिए कार्यपालिका मार्ग से प्रतिवेदन भेजते हैं। अनुच्छेद-जड़ मुकदमेबाजी का स्तर भी बदलती है। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक हटाने या निर्वाचन आयोग नियंत्रण की गड़बड़ी संवैधानिक प्रश्न बनती है, जबकि केंद्रीय सूचना आयोग नियुक्ति या केंद्रीय सतर्कता आयोग प्रक्रिया की गड़बड़ी पहले मूल अधिनियम की व्याख्या से शुरू होती है।
