मूल संवैधानिक पहचान और लागू अधिकार
संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत हुआ और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। प्रस्तावना भारत को संप्रभु समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बताती है और न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता को व्याख्या का आधार बनाती है। संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 ने 1976-12-18 को प्रस्तावना में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता जोड़े तथा अनुच्छेद 51A में मौलिक कर्तव्य जोड़े। एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ ने पंथनिरपेक्षता को मूल संरचना से जोड़ा और अनुच्छेद 356 की उद्घोषणा को न्यायिक समीक्षा के अधीन माना। भाग 3 राज्य-शक्ति पर लागू सीमा बनाता है। अनुच्छेद 14 - विधि के समक्ष समानता और विधियों का समान संरक्षण मनमानी रोकता है। अनुच्छेद 21 - जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण हर व्यक्ति को विधिक और निष्पक्ष प्रक्रिया के बिना वंचन से बचाता है। अनुच्छेद 19 नागरिकों तक सीमित है। राजस्थान में जयपुर की भर्ती, जोधपुर का निरोध आदेश और उच्च न्यायालय की अनुच्छेद 226 रिट इसी भेद को व्यावहारिक बनाते हैं। मौलिक कर्तव्य नागरिक दायित्व बताते हैं, पर उनका प्रवर्तन सामान्यतः किसी कानून पर निर्भर रहता है। संवैधानिक पहचान यह भी स्पष्ट करती है कि प्रस्तावना व्याख्यात्मक है, स्वतंत्र उपचार नहीं। बेरुबारी ने प्रारंभिक सीमित दृष्टि दी, केशवानंद ने प्रस्तावना को संविधान का भाग माना और बोम्मई ने उसके पंथनिरपेक्ष चरित्र से राज्यों में संघीय हस्तक्षेप नियंत्रित किया।
