मूल जनगणना ढांचा: राजस्थान नगरीकरण दर
राजस्थान नगरीकरण दर (जनगणना 2011) इस विषय की मूल संख्या है। 2011 में राज्य की शहरी आबादी लगभग 1 करोड़ 70 लाख थी, जो कुल आबादी का 24.87 प्रतिशत थी, जबकि भारत का शहरी हिस्सा लगभग 31.16 प्रतिशत था। यह अंतर केवल दशमलव का अंतर नहीं है; इसके पीछे बड़ा मरुस्थलीय क्षेत्र, बिखरी हुई बसावट, जल-अभाव और कई बड़े गांवों का देर से पूर्ण शहरी सेवाओं में बदलना है। शहरी हिस्सा 2001 में 23.39 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 24.87 प्रतिशत हुआ। अलग से, राजस्थान शहरी दशकीय वृद्धि 2001-2011 में शहरी आबादी 29.0 प्रतिशत, यानी 38.33 लाख अतिरिक्त शहरी निवासी, बढ़ी। वृद्धि वास्तविक थी, लेकिन अधिक औद्योगीकृत राज्यों जैसी तेज संरचनात्मक छलांग नहीं थी। आरएएस भूगोल में नगरीकरण को केवल जनसंख्या कुल से नहीं, बल्कि बसावट-क्रम और क्षेत्रीय जल सीमाओं के साथ पढ़ना पड़ता है। जयपुर-कोटा-अजमेर की तस्वीर डूंगरपुर, बाड़मेर या बांसवाड़ा को नहीं समझाती। इसी तरह कई गांवों वाला जिला भी परिवहन, खनन, पर्यटन, प्रशासन या शिक्षा गलियारे पर बैठा हो तो मजबूत कस्बाई केंद्र रख सकता है। राज्य नीति 2011 में 297 शहरी केंद्र बताती है, पर उनका वितरण असमान था। पूर्वी राजस्थान, हाड़ौती, जयपुर क्षेत्र, अजमेर-मेवाड़ पर्यटन पट्टी और कुछ मरुस्थलीय संसाधन जिले अलग-अलग रास्तों से शहरी बने। इसलिए यही जनगणना प्रतिशत तीन प्रश्न खोलता है: शहर कितने बड़े हैं, कितने नगरों को नगरपालिका दर्जा है और कौन-से जिले सामाजिक-आर्थिक रूप से अभी भी ग्रामीण हैं। एक और परत घरेलू मांग की है। नगरीकरण पाइप जल, सीवर, किराया आवास, सड़क प्रकाश, पक्की सड़क, कचरा प्रसंस्करण और सार्वजनिक परिवहन की मांग बढ़ाता है, भले ही हर बसावट महानगरीय न दिखे। गर्मी, धूल और अनियमित मानसूनी निकास जलवायु दबाव जोड़ते हैं। राजस्थान में यह मांग अक्सर मध्यम नगरों और शहरी बनते गांवों में आती है, जहाँ नगरपालिका राजस्व पतला रहता है; इसलिए जनगणना संख्या को सेवा क्षमता से जोड़ना जरूरी है।
