मूल भारत का व्यापक भौगोलिक ढांचा
भौगोलिक प्रादेशिक विभाजन में धरातलीय संरचना, प्रक्रिया और स्थलरूप विकास की अवस्था साथ पढ़ी जाती है। भारत एक जैसा राहत-क्षेत्र नहीं है: उत्तरी और उत्तर-पूर्वी पर्वत, उत्तरी मैदान, प्रायद्वीपीय पठार, भारतीय मरुस्थल, तटीय मैदान और द्वीप छह बड़े भाग हैं जिनकी चट्टान-आयु, ढाल, अपवाह और संसाधन अलग हैं। हिमालय युवा, ऊंचा और विवर्तनिक रूप से सक्रिय है; प्रायद्वीपीय भाग पुराना, कठोर और स्थिर है; सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान नदी-अवसाद से भरा गहरा जलोढ़ गर्त है। हिमाद्रि-हिमाचल-शिवालिक हिमालयी विभाग पर्वतीय इकाई में आता है, जबकि प्रायद्वीपीय पठार - मध्य उच्चभूमि और दक्कन पठार प्राचीन स्थिर भाग में आते हैं। राजस्थान इस ढांचे को स्थानीय बनाता है: अरावली प्राचीन वलित पर्वत तंत्र पुराने ढाल-किनारे पर है, और पश्चिमी राजस्थान का थार मरुस्थल अरावली के पश्चिम में उसी व्यापक आधार पर फैला है। एक ही राज्य में चट्टानी ऊंचाइयां, रेतीले मैदान, अंतर्देशीय अपवाह और पठारी किनारे साथ दिखते हैं। यही व्यापक ढांचा कारण और परिणाम को भी साथ रखता है। पर्वतीय राहत हिम-पोषित और वर्षा-पोषित अपवाह को नियंत्रित करती है; मैदान नया और पुराना जलोढ़ संचित करते हैं; पठारी सतह खनिज और कठोर चट्टानें दिखाती है; मरुस्थल पवन-कार्य, लवणीय अवसाद और जल-अभाव दिखाता है; तट समुद्री डूबान या उद्गमन दिखाते हैं; द्वीप समुद्रतल, ज्वालामुखीय और प्रवाल इतिहास बचाए रखते हैं। राजस्थान की स्थिति विशेष रूप से उपयोगी है क्योंकि यहां पुराना ढाल, क्षरित वलित श्रेणी और गर्म मरुस्थल मिलते हैं। राज्य में पश्चिम से पूर्व की एक रेखा टीलों और लवणीय अवसादों से अरावली विभाजक होते हुए अधिक नदी-युक्त मैदानों तक जाती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि पर्वत, मैदान और मरुस्थल साथ हों तो राहत, अपवाह और मिट्टी को मिलाकर पढ़ना पड़ता है।
