मूल सिंधु बेसिन और पंजाब सहायक नदियाँ
सिंधु नदी तंत्र और पंजाब की 5 सहायक नदियां भारत के उत्तर-पश्चिम अपवाह का मूल आधार हैं। एनसीईआरटी पंचनद समूह को सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब और झेलम के रूप में बताती है। 1960 की सिंधु जल संधि पश्चिमी नदियों, यानी सिंधु-झेलम-चिनाब, को पूर्वी नदियों, यानी रावी-ब्यास-सतलुज, से अलग करती है। यह कानूनी विभाजन भूगोल में इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि नदी, नहर और राजनीतिक सीमा एक ही तर्क से नहीं चलतीं। सतलुज-ब्यास पक्ष नहर प्रणालियों को जल देता है, जो राजस्थान के शुष्क उत्तर-पश्चिम तक पानी पहुंचाती हैं। इसलिए श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ की कृषि राजस्थान के बाहर स्थित हिमालयी बेसिन से जुड़ती है। सिंधु मार्ग यह भी बताता है कि प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र भौतिक रूप से निरंतर हो सकता है, पर उसका जल-प्रबंधन अंतरराष्ट्रीय सीमा से बंट सकता है। ऊपरी भाग हिमनद और हिमपात से जल पाते हैं, इसलिए तंत्र बारहमासी है। नीचे उपयोग बैराज, लिंक नहर और आवंटन नियमों पर निर्भर करता है। मानचित्र प्रश्न में झेलम और चिनाब पश्चिमी ओर रहते हैं। रावी और ब्यास मध्य पंजाब पट्टी में आते हैं। सतलुज व्यापक सिंधु नेटवर्क से मैदानों में जुड़ने से पहले पंजाब की पूर्वी बड़ी नदी है। राजस्थान संबंध स्थानीय उद्गम नहीं, बल्कि स्थानांतरित जल, नहर सिंचाई और मरुस्थलीय बसावट है। यह बेसिन पूर्ववर्ती हिमालयी अपवाह भी दिखाता है, जहां ऊपरी धाराएं कठोर पर्वतीय अवरोधों को काटकर व्यापक मैदानों में प्रवेश करती हैं। पंजाब की सहायक नदियों का रणनीतिक मूल्य अधिक है, क्योंकि किसी एक हेडवर्क या बैराज में बदलाव पर्वतीय स्रोत से बहुत दूर सिंचाई आपूर्ति बदल सकता है। इसलिए सिंधु उदाहरण को भौतिक भूगोल और जल-प्रशासन, दोनों के रूप में पढ़ना चाहिए। इसमें हिमनद आपूर्ति, जलोढ़ मैदान, नहर-कमान क्षेत्र, सीमा-राजनीति और मरुस्थलीय खेती एक जुड़े हुए अपवाह उदाहरण में मिलते हैं। यही नाम कई क्रम-प्रश्नों में भी आते हैं, जहां गलत उत्तर चिनाब या रावी को पंजाब क्रम की गलत ओर रख देता है। भरोसेमंद मानचित्र-छवि इन सहायक नदियों को उत्तर-पश्चिमी पंखे की तरह रखती है, गंगा मैदान या प्रायद्वीपीय पठार में नहीं।
