मुख्य बिंदु

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    भारतीय अपवाह को हिमालयी, प्रायद्वीपीय, तटीय और आंतरिक तंत्रों में अलग करने से स्रोत, ऋतु और निकास स्पष्ट होते हैं।

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    सिंधु समूह उत्तर-पश्चिम का पारसीमित तंत्र है; झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज पंजाब सहायक नदी-समूह बनाते हैं।

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    भागीरथी और अलकनंदा के देवप्रयाग संगम के बाद गंगा नाम चलता है और आगे गंगीय जलोढ़ मैदान बनता है।

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    यमुना में चंबल, बेतवा और केन प्रायद्वीपीय अग्रभूमि से आती हैं, इसलिए मैदान और पठार का संपर्क बनता है।

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    ब्रह्मपुत्र तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो, अरुणाचल में सियांग-दिहांग और असम में ब्रह्मपुत्र के रूप में दिखती है।

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    गोदावरी, कृष्णा, महानदी और कावेरी बंगाल की खाड़ी की ओर जाती हैं; नर्मदा और ताप्ती पश्चिममुखी रिफ्ट अपवाद हैं।

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    वुलर, चिलिका, वेम्बनाड-कोल और सांभर में झील-प्रकार, राज्य, लवणता और रामसर वर्ष अलग-अलग जांचे जाते हैं।

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    राजस्थान संबंध इंदिरा गांधी नहर, चंबल पट्टी, सांभर लवणीय झील और लूणी आंतरिक अपवाह से बनता है।

सिंधु बेसिन और पंजाब सहायक नदियाँ

सिंधु नदी तंत्र और पंजाब की 5 सहायक नदियां भारत के उत्तर-पश्चिम अपवाह का मूल आधार हैं। एनसीईआरटी पंचनद समूह को सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब और झेलम के रूप में बताती है। 1960 की सिंधु जल संधि पश्चिमी नदियों, यानी सिंधु-झेलम-चिनाब, को पूर्वी नदियों, यानी रावी-ब्यास-सतलुज, से अलग करती है। यह कानूनी विभाजन भूगोल में इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि नदी, नहर और राजनीतिक सीमा एक ही तर्क से नहीं चलतीं। सतलुज-ब्यास पक्ष नहर प्रणालियों को जल देता है, जो राजस्थान के शुष्क उत्तर-पश्चिम तक पानी पहुंचाती हैं। इसलिए श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ की कृषि राजस्थान के बाहर स्थित हिमालयी बेसिन से जुड़ती है। सिंधु मार्ग यह भी बताता है कि प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र भौतिक रूप से निरंतर हो सकता है, पर उसका जल-प्रबंधन अंतरराष्ट्रीय सीमा से बंट सकता है। ऊपरी भाग हिमनद और हिमपात से जल पाते हैं, इसलिए तंत्र बारहमासी है। नीचे उपयोग बैराज, लिंक नहर और आवंटन नियमों पर निर्भर करता है। मानचित्र प्रश्न में झेलम और चिनाब पश्चिमी ओर रहते हैं। रावी और ब्यास मध्य पंजाब पट्टी में आते हैं। सतलुज व्यापक सिंधु नेटवर्क से मैदानों में जुड़ने से पहले पंजाब की पूर्वी बड़ी नदी है। राजस्थान संबंध स्थानीय उद्गम नहीं, बल्कि स्थानांतरित जल, नहर सिंचाई और मरुस्थलीय बसावट है। यह बेसिन पूर्ववर्ती हिमालयी अपवाह भी दिखाता है, जहां ऊपरी धाराएं कठोर पर्वतीय अवरोधों को काटकर व्यापक मैदानों में प्रवेश करती हैं। पंजाब की सहायक नदियों का रणनीतिक मूल्य अधिक है, क्योंकि किसी एक हेडवर्क या बैराज में बदलाव पर्वतीय स्रोत से बहुत दूर सिंचाई आपूर्ति बदल सकता है। इसलिए सिंधु उदाहरण को भौतिक भूगोल और जल-प्रशासन, दोनों के रूप में पढ़ना चाहिए। इसमें हिमनद आपूर्ति, जलोढ़ मैदान, नहर-कमान क्षेत्र, सीमा-राजनीति और मरुस्थलीय खेती एक जुड़े हुए अपवाह उदाहरण में मिलते हैं। यही नाम कई क्रम-प्रश्नों में भी आते हैं, जहां गलत उत्तर चिनाब या रावी को पंजाब क्रम की गलत ओर रख देता है। भरोसेमंद मानचित्र-छवि इन सहायक नदियों को उत्तर-पश्चिमी पंखे की तरह रखती है, गंगा मैदान या प्रायद्वीपीय पठार में नहीं।

संभावित RAS प्रश्न

PYQ रुझान और 2026 पाठ्यक्रम विश्लेषण पर आधारित

1 MCQ उत्तर-पश्चिम अपवाह में पंजाब सहायक नदी-समूह से सही रूप में जुड़ा विकल्प कौन सा है?
  1. A झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज सही उत्तर
  2. B घाघरा, गंडक, कोसी, सोन और दामोदर
  3. C गोदावरी, कृष्णा, पेन्नार, पालार और वैगई
  4. D लूणी, बनास, माही, साबरमती और चंबल

व्याख्या

विकल्प क सही है क्योंकि ये पाँच नदियाँ सिंधु तंत्र से जुड़ा पारंपरिक पंजाब समूह बनाती हैं। संधि-आवंटन में भी रावी-ब्यास-सतलुज और सिंधु-झेलम-चिनाब अलग होते हैं, इसलिए यही नाम मानचित्र और जल-वितरण दोनों में केंद्रीय हैं। विकल्प ख गंगा पक्ष की सहायक नदियों और दामोदर को मिलाता है। विकल्प ग दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीपीय समूह है। विकल्प घ राजस्थान और पश्चिमी अपवाह नामों का मिश्रण है, पंजाब समूह नहीं।