मूल भौगोलिक तंत्र के रूप में सिंचाई
सिंचाई खेतों तक नियंत्रित जल पहुँचाने की प्रक्रिया है, पर भारतीय भूगोल में इसे एक पूरी श्रृंखला के रूप में समझना सही है: स्रोत, भंडारण या मोड़, वहन, कमांड क्षेत्र, खेत-स्तर वितरण और निकास। कोई बांध जल जमा कर सकता है, लेकिन खेत-चैनल न हों तो सुरक्षित फसल जल नहीं बनता। कोई नलकूप तुरंत एक खेत को पानी दे सकता है, पर लगातार दोहन से जलभृत नीचे जा सकता है। कोई नहर बड़ा कमांड क्षेत्र बना सकती है, फिर भी रिसाव, असमतल भूमि और निकास की कमी जलभराव या लवणता ला सकती है। राजस्थान में यह श्रृंखला साफ दिखती है, क्योंकि पश्चिमी जिलों को दूरस्थ नदियों से नहर जल मिलता है, जबकि पूर्वी और दक्षिणी भाग टैंक, कुएँ, छोटे जलाशय और सूक्ष्म सिंचाई पर निर्भर रहते हैं। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 2015-16 में शुरू हुई और यह हर खेत को पानी, प्रति बूंद अधिक फसल तथा जलागम विकास को जोड़ती है। कमांड क्षेत्र विकास कार्यक्रम 1974-75 में शुरू हुआ; इसमें खेत-चैनल, निकास, भूमि समतलीकरण और जल-उपयोगकर्ता भागीदारी से निर्मित सिंचाई क्षमता वास्तविक खेत सिंचाई में बदलती है। 6वीं लघु सिंचाई गणना स्रोत के आधार पर अंतर बताती है: भूजल योजनाओं में कुएँ और नलकूप आते हैं, जबकि सतही योजनाओं में प्रवाह और लिफ्ट सिंचाई आती है। इसी से सिंधु-गंगा जलोढ़ मैदान में नलकूप सिंचाई, दक्षिण भारत की कठोर चट्टानी लाल मिट्टी में टैंक सिंचाई और उत्तर भारतीय जलोढ़ मैदानों की नहर सिंचाई अलग-अलग भौगोलिक उत्तर बनते हैं। राजस्थान के कम वर्षा वाले जिलों को बड़े नहर कमांड, जल-दक्ष सूक्ष्म सिंचाई और भूजल प्रबंधन तीनों की आवश्यकता रहती है। वर्गीकरण से भ्रम घटता है। बड़े और मध्यम प्रकल्प नदी नियमन, बांध सुरक्षा और अंतर-राज्य आवंटन से जुड़े होते हैं। लघु सिंचाई किसान के निकट होती है। सूक्ष्म सिंचाई स्रोत नहीं, खेत में जल लगाने की तकनीक है। राजस्थान में एक ही गाँव नहर, कुआँ और ड्रिप तीनों से जुड़ सकता है।
