मूल ऋतु, जल और फसल चयन
खरीफ-रबी-जायद फसल कैलेंडर भारतीय कृषि की मूल संरचना है। खरीफ फसलें दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर रहती हैं; धान, कपास, जूट, ज्वार, बाजरा और अरहर जून-सितंबर की वर्षा के साथ बोई जाती हैं, हालांकि सिंचाई जिला-वार अंतर बदल सकती है। रबी में गेहूं, चना और सरसों ठंडी ऋतु, नहर जल, नलकूप या बची हुई मिट्टी नमी से चलते हैं। जायद अप्रैल-जून की छोटी सिंचित अवधि है, जिसमें सब्जियां, चारा और ककड़ी वर्ग की फसलें आती हैं। राजस्थान में यह अंतर बहुत स्पष्ट है: बाड़मेर, जैसलमेर और नागौर का बाजरा खरीफ शुष्कभूमि फसल है, जबकि श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और भरतपुर की सरसों तथा गेहूं रबी की नहर और कुओं से जुड़ी खेती है। यही कैलेंडर वर्षा-आधारित और सिंचित खेती को अलग करता है। फसल ऋतु में मिट्टी की नमी पर्याप्त है या नहीं, इससे कमजोर मानसून पहले दालों और मोटे अनाज को प्रभावित करता है, जबकि सिंचित गेहूं पर असर जलाशय और नहर आपूर्ति से बाद में आता है। इसलिए फसल का नाम अकेले पर्याप्त नहीं; सही कृषि क्षेत्र में ऋतु, जल, मिट्टी, जिला और बाजार साथ आते हैं। ऋतु समय यह भी बताता है कि स्थानांतरित खेती के नाम राजस्थान उदाहरण नहीं बनते: ओडिशा का पोंडू, केरल का पूनम और असम-उत्तर-पूर्व का झूम वन परती, ढाल और अधिक वर्षा से जुड़े हैं, जबकि थार गांवों में मेड़बंदी, कठोर बीज और पशुधन खाद महत्त्वपूर्ण हैं।
