मूल संवैधानिक ढाँचा और राजस्थान की शुरुआत
पंचायती राज लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की ग्रामीण स्थानीय-सरकार शाखा है। इसका संवैधानिक आधार संविधान का भाग 9 है, जिसे 73वें संविधान संशोधन, 1992 ने जोड़ा; अनुच्छेद 243 पंचायत संबंधी शब्दावली देता है और ग्यारहवीं अनुसूची पंचायतों को सौंपे जा सकने वाले 29 विषयों की सूची देती है। इनमें कृषि, भूमि-सुधार, लघु सिंचाई, पशुपालन, ग्रामीण आवास, सड़क, गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और सामाजिक कल्याण शामिल हैं। समिति-क्रम से यह ढाँचा स्पष्ट होता है। बलवंत राय मेहता समिति (1957) ने सामुदायिक विकास को त्रि-स्तरीय व्यवस्था से जोड़ा; अशोक मेहता समिति (1977) ने जिला स्तर को मजबूत करने और द्वि-स्तरीय पैटर्न का पक्ष लिया; जी.वी.के. राव समिति (1985) ने जिला योजना और प्रखंड प्रशासन को विकास बहस में रखा; एल.एम. सिंघवी समिति (1986) ने संवैधानिक दर्जे और न्याय पंचायतों की संस्तुति की। राजस्थान इस कहानी में केंद्रीय है। नागौर में पंचायती राज का उद्घाटन (राजस्थान, 1959) 1959-10-02 को हुआ, जब जवाहरलाल नेहरू ने व्यवस्था शुरू की; राजस्थान पहला राज्य बना और नागौर की शुरुआत भारतीय पंचायती राज का मानक आरंभ-बिंदु मानी जाती है। राष्ट्रीय संवैधानिक बदलाव के बाद राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 ने ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद की राज्य-स्तरीय विधिक संरचना दी। यही ढाँचा नागौर, बांसवाड़ा, गंगानगर और बाड़मेर जैसे जिलों में अलग-अलग ग्रामीण जरूरतों को संस्था, योजना और लेखा से जोड़ता है।
