मूल जलवायु परिवर्तन और हरितगृह प्रक्रिया
जलवायु परिवर्तन औसत तापमान, वर्षा, आर्द्रता, समुद्र-स्तर, हिमावरण, पवन-परिसंचरण और चरम घटनाओं की आवृत्ति में दीर्घकालिक बदलाव है। इसका वैज्ञानिक केंद्र बढ़ा हुआ हरितगृह प्रभाव है। सौर विकिरण पृथ्वी तंत्र में अधिकतर छोटी तरंग ऊर्जा के रूप में प्रवेश करता है। पृथ्वी की सतह लंबी तरंगों वाली अवरक्त ऊर्जा उत्सर्जित करती है। कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, ओजोन और फ्लोरीनयुक्त गैसें बाहर जाती ऊष्मा का कुछ भाग अवशोषित करके फिर विकिरित करती हैं। प्राकृतिक हरितगृह प्रभाव न हो तो पृथ्वी बहुत ठंडी होती। पर जीवाश्म ईंधन दहन, सीमेंट निर्माण, वनों की कटाई, धान के खेत, पशुधन, उर्वरक, कचरा-स्थल और औद्योगिक गैसों से निकले मानवजनित उत्सर्जनों ने इस ऊष्मा-जाल को मजबूत किया है। यूएनएफसीसी हरितगृह गैसों और जलवायु तंत्र की भाषा इसलिए प्रयोग करता है कि तापवृद्धि केवल थर्मामीटर की संख्या नहीं बदलती। वह महासागर, हिममंडल, मानसून परिसंचरण, पारिस्थितिकी तंत्र, कृषि, मानव स्वास्थ्य और आपदा-जोखिम को भी बदलती है। राजस्थान में यह अंतर तुरंत दिखता है। लू की घटनाएं मजदूरों, स्कूली बच्चों, पशुधन और शहरी गरीबों को ऊष्मा-तनाव के सामने लाती हैं। थार मरुस्थल उच्च तापमान, वाष्पीकरण और जल-अभाव के संबंध को साफ दिखाता है। कोयला संयंत्र, वाहन या भट्ठे से निकला वही कार्बन डाइऑक्साइड अणु वैश्विक वायुमंडल में मिल जाता है, पर संवेदनशीलता स्थानीय रहती है। घटते भूजल, विरल वनस्पति और अनौपचारिक बाहरी श्रम वाला मरुस्थलीय जिला जलवायु जोखिम को तटीय जिले से अलग ढंग से अनुभव करता है।
