केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) ने पूरी अरावली पर्वत श्रृंखला में नए खनन पट्टों पर व्यापक प्रतिबंध लागू किया। मंत्रालय ने कहा कि यह प्रतिबंध राज्य सीमाओं की परवाह किए बिना पूरे अरावली परिदृश्य पर समान रूप से लागू होगा और इसमें दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा एवं गुजरात शामिल हैं। यह निर्देश सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकार की गई अरावली की परिभाषा के बाद जारी किया गया, जिसके अनुसार वे पहाड़ियाँ जो आसपास के क्षेत्र से कम से कम 100 मीटर ऊपर उठती हैं, अरावली मानी जाएँगी, तथा 500 मीटर से अधिक मैदान द्वारा अलग की गई पर्वत श्रृंखलाओं को अलग संरचनाओं के रूप में माना जाएगा। अरावली श्रृंखला रेगिस्तानीकरण को रोकती है, जैव विविधता को बढ़ावा देती है, भूजल भंडारों को फिर से भरती है, तथा उत्तर-पश्चिमी भारत में करोड़ों लोगों को महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्रदान करती है। कार्यान्वयन चरण के लिए, भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) को उन अतिरिक्त क्षेत्रों की पहचान करने का काम सौंपा गया है जहाँ खनन पर पूर्ण प्रतिबंध जरूरी है। इसके साथ ही ICFRE एक व्यापक, विज्ञान-आधारित सतत खनन प्रबंधन योजना (MPSM) तैयार करेगा, जो पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करेगी एवं पारिस्थितिकी वहन क्षमता का मूल्यांकन करेगी। चारों प्रभावित राज्यों की सरकारों को सभी पर्यावरणीय रक्षोपायों का सख्त अनुपालन सुनिश्चित करना होगा तथा सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का पूरी तरह पालन करना होगा। वर्तमान में चालू खानों पर बढ़ी हुई निगरानी एवं अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए गए हैं। क्षेत्रफल की दृष्टि से अरावली का सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान में है, इसलिए सबसे महत्वपूर्ण प्रवर्तन की अपेक्षा भी राजस्थान से है, जो उसके खान, वन, राजस्व एवं परिवहन विभागों के समन्वय से होगा। यह निर्णय अरावली पट्टी में दशकों से अवैध खनन, वनोन्मूलन तथा रेगिस्तानीकरण की चिंताओं पर केंद्र की प्रतिक्रिया को दर्शाता है और इस श्रृंखला को भारत के पारिस्थितिकी सुरक्षा ढांचे में एक प्रमुख कड़ी के रूप में स्थापित करता है।