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राजव्यवस्था, शासन एवं समसामयिकी

राजस्थान का चुनावी इतिहास (1952–2023)

राजस्थान: राजनीतिक भागीदारी, नेतृत्व, निर्वाचन व्यवहार

पेपर III · इकाई 1 अनुभाग 3 / 10 0 PYQ 24 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

राजस्थान का चुनावी इतिहास (1952–2023)

2.1 गठन का चरण (1952–1972)

राजस्थान 1 नवंबर 1956 को पूर्ण राज्य बना जब राज्य पुनर्गठन अधिनियम ने पूर्ववर्ती अजमेर राज्य और बिखरे हुए क्षेत्रों को इसमें मिला दिया। इससे पहले, राज्य में राजस्थान अधिनियम 1949 के तहत 1952 में प्रथम विधानसभा चुनाव हो चुका था।

प्रथम चुनाव (1952)

विधानसभा में 160 सीटें थीं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) ने 40.1% मत प्रतिशत के साथ 82 सीटें जीतीं। जनसंघ ने 8 सीटें जीतीं। जय नारायण व्यास (जय नारायण व्यास के नाम से भी प्रसिद्ध) प्रथम निर्वाचित मुख्यमंत्री बने।

व्यास जोधपुर के एक वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी और प्रजा मंडल नेता थे जिन्होंने रियासतों के एकीकरण के लिए संघर्ष किया था। 1952 चुनाव में भागीदारी सीमित रही — मतदान केवल 44.5% था और कई मतदाता लोकतांत्रिक चुनावों में पहली बार भाग ले रहे थे।

मोहनलाल सुखाड़िया युग (1954–1971)

प्रारंभिक राजस्थान राजनीति के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व, मोहनलाल सुखाड़िया ने 17 वर्षों तक (1954–1971, रुक-रुककर) अभूतपूर्व अवधि के लिए मुख्यमंत्री के रूप में सेवा की। उनके प्रमुख योगदान:

  • राज्य में कांग्रेस का आधिपत्य स्थापित किया
  • व्यापक सिंचाई परियोजनाओं की देखरेख की (राजस्थान नहर / इंदिरा गांधी नहर की उत्पत्ति)
  • संरक्षण नेटवर्क स्थापित किए जो दशकों तक राजस्थान की राजनीति को परिभाषित करते रहे
  • सामंती समायोजन का अभ्यास किया — पूर्व रियासत शासकों को कांग्रेस नेटवर्क में शामिल किया, तब भी जब प्रिवी पर्स प्रणाली बनी रही

1967 चुनाव और कांग्रेस विखंडन

INC ने 89/184 सीटें जीतीं — कमजोर बहुमत जो कामराज योजना के बाद कांग्रेस विभाजन को दर्शाता है। जनसंघ मुख्य विपक्ष के रूप में उभरा। इसी काल में प्रतिस्पर्धात्मक द्विदलीय राजनीति के बीज पड़े।

2.2 जनता अंतराल और कांग्रेस का आधिपत्य (1972–1990)

1977 का महत्वपूर्ण चुनाव

1977 चुनाव एक転換बिंदु था — आपातकाल के बाद की जनता पार्टी की लहर ने राजस्थान को भी प्रभावित किया। जनता पार्टी और भारत लोकदल ने मिलकर 151/200 सीटें जीतीं, और भैरोंसिंह शेखावत (जनसंघ/जनता) पहली बार CM बने।

यह सर्वOBC, राजपूत और व्यापारी गठबंधन के उदय का संकेत था जो बाद में BJP के चुनावी आधार के रूप में समेकित हुआ।

1980 और 1985 में कांग्रेस की जीत

कांग्रेस ने 1980 (133/200 सीटें) और 1985 में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की लहर पर वापसी की। किंतु इस युग ने राजस्थान-विशिष्ट महत्वपूर्ण तनाव भी उजागर किए:

  • संवैधानिक आरक्षण के बावजूद SC/ST प्रतिनिधित्व सीमित रहा
  • महिलाओं की राजनीतिक उपस्थिति नगण्य थी — विधायकों में शायद ही 5% से अधिक
  • राजनीतिक गतिशीलता में ग्रामीण-शहरी असमानताएं स्पष्ट थीं

2.3 सत्ता-विरोधी ताला (1993–2023)

राजस्थान के समकालीन चुनावी परिदृश्य की परिभाषित विशेषता सत्ता-विरोधी परिवर्तन पैटर्न है — 1993 से, प्रत्येक सत्तारूढ़ दल बिना किसी अपवाद के अगले चुनाव में सत्ता से बाहर हो गया है:

चुनाव सत्तारूढ़ दल परिणाम नए CM
1993 कांग्रेस (हारी) BJP 95 जीती भैरोंसिंह शेखावत
1998 BJP (हारी) कांग्रेस 153 जीती अशोक गहलोत
2003 कांग्रेस (हारी) BJP 120 जीती वसुंधरा राजे
2008 BJP (हारी) कांग्रेस 96 जीती अशोक गहलोत
2013 कांग्रेस (हारी) BJP 163 जीती वसुंधरा राजे
2018 BJP (हारी) कांग्रेस 100 जीती अशोक गहलोत
2023 कांग्रेस (हारी) BJP 115 जीती भजनलाल शर्मा

सत्ता-विरोधी के लिए स्पष्टीकरण

  • कृषि अर्थव्यवस्था — किसान फसल विफलता, जल की कमी और बाजार मूल्यों के लिए वर्तमान सरकार को दोषी मानते हैं
  • संरक्षण-नेटवर्क थकान — नेटवर्क प्रत्येक कार्यकाल में सभी प्रतिस्पर्धी गुटों को संतुष्ट नहीं कर सकते
  • संरचनात्मक द्विदलीय प्रतिस्पर्धा — विरोध-मतदान आसान है क्योंकि तैयार विकल्प सदा उपलब्ध है
  • आकांक्षात्मक अंतराल — उभरते मध्यवर्ग और युवा किसी भी सरकार की तुलना में तेज विकास की मांग करते हैं

2023 चुनाव

2023 चुनाव ने गहलोत सरकार की कल्याण योजना वितरण (MAA योजना, अन्नपूर्णा रसोई, OPS बहाली) के बावजूद पैटर्न की पुष्टि की। PM मोदी के नेतृत्व में BJP के अभियान ने भ्रष्टाचार-विरोध और विकास पर ध्यान केंद्रित किया, कांग्रेस के 39.5% (69 सीटें) की तुलना में 41.7% मत प्रतिशत के साथ 115 सीटें जीतीं।