सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन
संभावित प्रश्न एवं आदर्श उत्तर
Q1 (5 अंक — 50 शब्द): NOTA क्या है? इसे लागू करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लेख कीजिए।
आदर्श उत्तर:
NOTA (उपरोक्त में से कोई नहीं) EVM पर एक विकल्प है जो मतदाताओं को मत गोपनीयता बनाए रखते हुए सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने का अवसर देता है। इसे PUCL बनाम भारत संघ (2013) के बाद प्रारंभ किया गया जिसमें SC ने निर्णय दिया कि मतदान के अधिकार में सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने का अधिकार शामिल है। नवंबर 2013 से सभी चुनावों में NOTA उपलब्ध है। NOTA मत अलग से गिने और प्रकाशित किए जाते हैं परंतु परिणाम प्रभावित नहीं होते — यदि NOTA को सर्वाधिक मत भी मिलें तो उम्मीदवारों में सर्वाधिक मत पाने वाला विजयी होता है।
Q2 (5 अंक — 50 शब्द): 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बॉण्ड योजना क्यों रद्द की?
आदर्श उत्तर:
ADR बनाम भारत संघ (2024) में SC ने सर्वसम्मति से (5 न्यायाधीश, CJI D.Y. Chandrachud) चुनावी बॉण्ड योजना रद्द की क्योंकि: (1) इसने Article 19(1)(a) के तहत मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन किया — मतदाताओं को राजनीतिक दलों के वित्तपोषकों को जानने का मूल अधिकार है; (2) गुमनाम दान ने quid pro quo भ्रष्टाचार को सक्षम किया; (3) Finance Act संशोधन प्रक्रियागत रूप से अनुचित थे। SBI को सभी डेटा ECI को सौंपने का निर्देश; डेटा सार्वजनिक प्रकाशित।
Q3 (5 अंक — 50 शब्द): EVM क्या हैं? इनकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करने वाली तीन विशेषताएँ बताइए।
आदर्श उत्तर:
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें (EVM) भारतीय चुनावों में कागज़ी मतपत्रों की जगह स्वतंत्र इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हैं, 2004 लोकसभा चुनावों से राष्ट्रव्यापी उपयोग में हैं, BEL और ECIL द्वारा निर्मित। तीन विश्वसनीयता विशेषताएँ: (1) कोई नेटवर्क कनेक्टिविटी नहीं — दूरस्थ हैकिंग असंभव; (2) अनूठी यूनिट ID और छेड़-प्रतिरोधी सील — किसी भी भौतिक छेड़छाड़ की पहचान; (3) VVPAT एकीकरण — कागज़ी पर्ची मतदाता को मतदान की पुष्टि करती है; ऑडिट के लिए अलग भंडारण। तकनीकी विशेषज्ञ समितियों (IIT प्रोफेसर) ने EVM को छेड़-प्रतिरोधी प्रमाणित किया है।
Q4 (10 अंक — 150 शब्द): 1990 के बाद भारत में प्रमुख चुनावी सुधारों की विवेचना कीजिए और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव पर उनके प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए।
आदर्श उत्तर:
1990 के बाद भारत के चुनावी सुधारों ने कई आयामों में चुनाव की अखंडता को रूपांतरित किया है:
संरचनात्मक सुधार:
- मतदान आयु 18 घटाई (61वाँ संशोधन, 1988, 1989 से प्रभावी) — 3.5 करोड़ नए मतदाता जोड़े।
- EVM अपनाना (2004 से राष्ट्रव्यापी): बूथ कब्जा, मतपत्र भराई, मतपत्र चोरी और मतगणना धोखाधड़ी समाप्त। ECI ने BEL और ECIL द्वारा निर्मित EVM को छेड़-प्रतिरोधी प्रमाणित किया। VVPAT (2019 राष्ट्रव्यापी) ने मतदाता-सत्यापन योग्य पेपर ऑडिट ट्रेल जोड़ा।
- NOTA (2013, PUCL मामला): मतपत्र खराब किए बिना मतदाता असंतोष की अभिव्यक्ति सक्षम।
पारदर्शिता सुधार:
- आपराधिक पूर्ववृत्त और संपत्ति का अनिवार्य प्रकटीकरण (ADR & PUCL बनाम भारत संघ, 2002): उम्मीदवारों को ECI वेबसाइट पर प्रकाशित शपथ-पत्रों में आपराधिक मामले, संपत्ति और शैक्षिक योग्यता घोषित करनी होती है।
- चुनावी बॉण्ड योजना रद्द (ADR बनाम भारत संघ, 2024): राजनीतिक वित्तपोषण में पारदर्शिता बहाल; SBI का दाता डेटा प्रकाशित।
प्रक्रिया सुधार:
- भुगतान राजनीतिक विज्ञापनों का पूर्व-प्रमाणन (2014 से): जिला/राज्य स्तर पर MCMC।
- cVIGIL app (2018): नागरिक जियोटैग्ड साक्ष्य के साथ MCC उल्लंघन रिपोर्ट करते हैं।
- आदर्श आचार संहिता प्रवर्तन — ECI ने पक्षपाती अधिकारियों को स्थानांतरित करने, राजनीतिक कार्यक्रमों को रद्द करने और जुर्माना लगाने के लिए Article 324 की पूर्ण शक्तियों का उपयोग किया।
लंबित सुधार:
- राजनीति का अपराधमुक्तिकरण: 2024 LS के 46% सांसदों ने आपराधिक मामले घोषित किए।
- चुनाव का राज्य वित्तपोषण: विधि आयोग रिपोर्टें समान अवसर के लिए आंशिक राज्य वित्तपोषण की सिफारिश करती हैं।
- एक राष्ट्र एक चुनाव: कोविंद समिति (2024) रिपोर्ट; संवैधानिक संशोधन विचाराधीन।
इन सुधारों के बावजूद चुनौतियाँ बनी हुई हैं: धन-शक्ति, अपराधी-राजनेता गठजोड़, सोशल मीडिया भ्रामक जानकारी और व्यय सीमाओं का अपर्याप्त प्रवर्तन।
Q5 (10 अंक — 150 शब्द): जाति, सत्ता-विरोध और आर्थिक मुद्दों के संदर्भ में भारत में मतदान व्यवहार के निर्धारकों का विश्लेषण कीजिए।
आदर्श उत्तर:
भारत में मतदान व्यवहार समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक कारकों की जटिल अन्तर्क्रिया से आकार लेता है।
जाति सबसे सुसंगत पूर्वानुमानक बनी हुई है। Lokniti/CSDS चुनाव अध्ययन लगातार दिखाते हैं कि मतदाता अपनी जाति या जातीय गठबंधन के उम्मीदवारों को मत देने की काफी अधिक संभावना रखते हैं। मंडल आयोग के OBC आरक्षण (1990) ने जाति को राजनीतिक पात्रता की इकाई के रूप में संस्थागत किया, मतदान में जाति-चेतना गहरी की। फिर भी जाति निर्धारक नहीं है — जाति गुट तब बिखरते हैं जब उम्मीदवार स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य हों या मुद्दे की प्रमुखता बहुत अधिक हो।
सत्ता-विरोध भारत में अद्वितीय रूप से मजबूत है — सत्तारूढ़ दल राज्य चुनावों में लगभग 65% बार हारते हैं। राजस्थान का एकांतर BJP-Congress प्रतिरूप (1993 से) पाठ्यपुस्तक उदाहरण है: मतदाता दलीय विचारधारा की परवाह किए बिना व्यवस्थित रूप से सत्तारूढ़ सरकारों को दंडित करते हैं। "विफलता की सज़ा" — कृषि, रोजगार, मुद्रास्फीति पर — इस प्रतिरूप को प्रेरित करती है। 2013 राजस्थान चुनाव में Congress NREGS और RTI का श्रेय लेने के बावजूद पराजित हुई; मतदाताओं ने भ्रष्टाचार और मूल्य वृद्धि पर ध्यान केंद्रित किया।
आर्थिक मुद्दे बढ़ते मध्यवर्ग और सूचना पहुँच के साथ प्रमुखता पर आए। 2014 की "मोदी लहर" आंशिक रूप से आर्थिक आकांक्षाओं — युवा बेरोजगारी, UPA-II के तहत धीमी वृद्धि और भ्रष्टाचार की धारणाओं — से प्रेरित थी। हालाँकि, विशुद्ध आर्थिक मतदान सीमित है — कल्याण लाभार्थी (NREGS, Ujjwala, PM Kisan) सामान्य आर्थिक परिस्थितियों की परवाह किए बिना कल्याण देने वाली सरकार के प्रति निष्ठा दिखाते हैं।
नए निर्धारक: सोशल मीडिया प्रवर्धन, WhatsApp-चालित कथा-ढाँचा और "नेता छवि" (राष्ट्रपति-शैली PM-केंद्रित चुनाव) विशेष रूप से शहरी युवाओं और पहली बार मतदान करने वालों में तेजी से मतदान को आकार दे रहे हैं।
Q6 (5 अंक — 50 शब्द): एक राष्ट्र-एक चुनाव प्रस्ताव क्या है? पक्ष और विपक्ष में दो-दो तर्क दीजिए।
आदर्श उत्तर:
एक राष्ट्र एक चुनाव में लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के एक साथ चुनाव का प्रस्ताव है। कोविंद समिति (2024) ने दो-चरणीय क्रियान्वयन की सिफारिश की। पक्ष में: (1) चुनावी खर्च और प्रशासनिक बोझ में कमी; (2) निर्बाध शासन — निरंतर MCC प्रतिबंधों की समाप्ति। विपक्ष में: (1) संघीय स्वायत्तता का उल्लंघन — राज्य अपने चुनावी चक्र पर नियंत्रण खो देते हैं; (2) राष्ट्रीय लहर चुनाव राज्य-विशिष्ट मुद्दों और शासन जवाबदेही को दबा सकते हैं। Articles 83, 85, 172, 174 में संवैधानिक संशोधन आवश्यक हैं।
