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अंतर-संबद्धता: भारतीय राजनीति में जाति, लिंग और वर्ग
6.1 दलित और OBC महिलाओं पर "दोहरा बोझ"
राजनीति विज्ञान अनुसंधान (नंदिनी देव, ज़ोया हसन) दर्शाता है कि दलित और OBC महिलाएँ अंतर-संबद्ध नुकसान का सामना करती हैं — वे महिलाओं के रूप में और हाशिए की जातियों की सदस्यों के रूप में दोनों हाशिए पर होती हैं। आरक्षण ढाँचे के भीतर भी:
- SC/ST आरक्षित सीटों के भीतर SC/ST महिला कोटा — लेकिन हमेशा महिलाओं द्वारा नहीं भरा जाता
- पंचायतों में महिला आरक्षण ने LS/राज्य विधानसभा सीटों की तुलना में SC/ST महिलाओं को अनुपातिक रूप से अधिक लाभ पहुँचाया है
- पार्टी टिकट वितरण: कांग्रेस और SP/BSP — निचली जातियों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाले दल — भी दलित पुरुषों की तुलना में दलित महिलाओं को कम टिकट देते हैं
राजनीति में दलित महिलाओं के सफल उदाहरण:
- द्रौपदी मुर्मू — भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति (2022–वर्तमान), संताली समुदाय की सदस्य
- मायावती — UP की मुख्यमंत्री (4 बार), BSP प्रमुख; राज्य की सर्वोच्च कार्यकारी पद पर दलित महिला
- K. K. शैलजा — केरल की मंत्री; ASHA कार्यकर्ताओं की गोलबंदी की उदाहरण
6.2 महिलाओं की राजनीतिक स्वायत्तता: राजनीतिक विद्यालय के रूप में स्व-सहायता समूह
NABARD-SHG संबंध कार्यक्रम (1992) और NRLM (राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, 2011) ने भारत भर में स्व-सहायता समूहों में 10+ करोड़ महिलाएँ तैयार की हैं। SHG कई मार्गों से राजनीतिक प्रशिक्षण मैदान के रूप में कार्य करते हैं:
- मासिक बैठकें सार्वजनिक बोलने और सामूहिक निर्णय लेने के कौशल विकसित करती हैं
- SHG सदस्य बैंकों, सरकारी कार्यालयों और PDS तक पहुँचती हैं — प्रशासनिक साक्षरता का निर्माण
- SHG नेटवर्क का उपयोग राजनीतिक दलों (विशेष रूप से UPA-I में कांग्रेस) द्वारा जमीनी महिला संपर्क बनाने के लिए किया गया है
- केरल में कुदुम्बश्री (9,00,000 महिला SHG सदस्य) SHG → स्थानीय शासन → राजनीतिक भागीदारी पाइपलाइन का सबसे सफल उदाहरण है
