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राजव्यवस्था, शासन एवं समसामयिकी

संभावित प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

दलीय व्यवस्था, क्षेत्रवाद, गठबंधन राजनीति

पेपर III · इकाई 1 अनुभाग 8 / 10 0 PYQ 23 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

संभावित प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

Q1 (5 अंक — 50 शब्द): कांग्रेस प्रणाली से आप क्या समझते हैं? इसे किसने प्रतिपादित किया?

आदर्श उत्तर:

कांग्रेस प्रणाली को राजनीतिक वैज्ञानिक राजनी कोठारी ने प्रतिपादित किया। 1952–1967 के भारतीय राजतंत्र में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक प्रभावी "सहमति की पार्टी" के रूप में कार्य करती थी — विभिन्न वैचारिक समूहों को आंतरिक रूप से समायोजित करते हुए। अन्य दल (समाजवादी, साम्यवादी, स्वतंत्र, जनसंघ) "दबाव की पार्टियाँ" थीं। 1967 में आठ राज्यों में कांग्रेस की पराजय से यह प्रणाली समाप्त हुई और भारत प्रतिस्पर्धी बहुदलीय राजनीति की ओर बढ़ा।


Q2 (5 अंक — 50 शब्द): भारत में क्षेत्रवाद के क्या कारण हैं?

आदर्श उत्तर:

भारत में क्षेत्रवाद के कारण: (1) भाषाई पहचान — भाषाई रूप से एकजातीय राज्यों की माँग (राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956); (2) आर्थिक असमानताएँ — पिछड़े क्षेत्र अलग राज्यत्व या विशेष पैकेजों की माँग; (3) सांस्कृतिक और जातीय दावा — तमिलनाडु में द्रविड़ पहचान, पूर्वोत्तर में जनजातीय पहचान; (4) केंद्र-राज्य नीतिगत शिकायतें — संसाधन-साझेदारी, वित्तीय विकेंद्रीकरण, नदी जल; (5) ऐतिहासिक कारक — पूर्व-औपनिवेशिक राज्यों और असमान औपनिवेशिक विकास से क्षेत्रीय पहचानें सुदृढ़।


Q3 (5 अंक — 50 शब्द): भारत में दल-बदल विरोधी कानून क्या है? अयोग्यता के दो आधार बताइए।

आदर्श उत्तर:

भारत का दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची, 52वाँ संविधान संशोधन 1985 द्वारा जोड़ी गई) दल बदलने या पार्टी व्हिप की अवहेलना करने वाले विधायकों को अयोग्य ठहराता है। अयोग्यता के दो आधार: (1) पार्टी सदस्यता का स्वेच्छिक त्याग — सदस्य दल छोड़े या निष्कासित हो; (2) पार्टी निर्देश के विरुद्ध मतदान — सदस्य पूर्व अनुमति के बिना पार्टी व्हिप के विरुद्ध मत दे या अनुपस्थित रहे। स्पीकर/सभापति निर्णयकर्ता। 2/3 विधायकों के विलय पर छूट।


Q4 (10 अंक — 150 शब्द): भारतीय गठबंधन राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

आदर्श उत्तर:

क्षेत्रीय दल 1989 से भारतीय लोकतंत्र के निर्णायक कारक रहे हैं। उनकी भूमिका रचनात्मक और समस्याजनक दोनों है।

रचनात्मक भूमिका: क्षेत्रीय दल उप-राष्ट्रीय पहचानों — भाषाई, सांस्कृतिक, जातीय — का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें राष्ट्रीय दल एकरूप करने की प्रवृत्ति रखते हैं। उन्होंने राज्य-विशिष्ट नीतिगत लाभ दिलाए: DMK ने UPA में तमिलनाडु अवसंरचना निधि सुनिश्चित की; TDP ने आंध्र विशेष दर्जे की वकालत की; वामपंथी दलों ने NREGS को UPA-I CMP (2004) में शामिल कराया। वे विविध हितों को आवाज देकर और राष्ट्रीय वर्चस्व को रोककर लोकतंत्र को गहरा करते हैं।

समस्याजनक पहलू: गठबंधन सरकारों में क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय नीति पर संकीर्ण हितों को प्राथमिकता देते हैं। पोर्टफोलियो आवंटन सौदेबाजी का माध्यम बन जाता है — जिससे शासन का विखंडन होता है। कुछ क्षेत्रीय दल व्यक्तित्व-पंथ हैं (DMK पर वंशवाद की आलोचना)। दल-बदल कानून की खामियाँ अवसरवादी गठबंधनों की अनुमति देती हैं — महाराष्ट्र Shiv Sena विभाजन (2022–23) ने सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप की आवश्यकता वाला संवैधानिक संकट उत्पन्न किया।

संतुलन: क्षेत्रीय दल भारतीय संघवाद की शक्ति और राष्ट्रीय शासन क्षमता की चुनौती दोनों हैं। राष्ट्रीय दलों को वास्तविक क्षेत्रीय संवेदनशीलता और क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय जिम्मेदारी विकसित करने में उत्तर निहित है।


Q5 (10 अंक — 150 शब्द): भारत की दलीय व्यवस्था के एकदल-प्रभुत्व से बहुदलीय गठबंधन युग तक के विकास का वर्णन कीजिए।

आदर्श उत्तर:

भारत की दलीय व्यवस्था चार विशिष्ट चरणों से गुजरी है:

चरण I — एकदल-प्रभुत्व (1952–1967): Nehru के नेतृत्व में कांग्रेस ने Lok Sabha की 60–75% सीटें जीतीं। राजनी कोठारी की "कांग्रेस प्रणाली" ने इसे विविध हितों को समायोजित करने वाली सहमति की पार्टी बताया। 1967 में आठ राज्यों में कांग्रेस ने सत्ता खोई — प्रभुत्व का अंत।

चरण II — कांग्रेस का पतन (1967–1989): Indira Gandhi ने 1969 में कांग्रेस को विभाजित किया; आपातकाल (1975–77) ने लाखों को राजनीतिक बनाया; जनता पार्टी ने 1977 में पहली गैर-कांग्रेस केंद्र सरकार बनाई पर 1979 में गिरी। कांग्रेस लौटी पर राज्य स्तर पर उसका वर्चस्व भाषाई और क्षेत्रीय दलों से चुनौतीग्रस्त रहा।

चरण III — गठबंधन युग (1989–2014): 25 वर्ष तक कोई दल LS बहुमत नहीं जीत सका। V.P. Singh (1989), P.V. Narasimha Rao अल्पमत (1991), United Front (1996–98), Vajpayee का NDA (24-दलीय गठबंधन, 1999–2004), UPA-I और UPA-II — क्षेत्रीय दलों के राजनिर्माता रूप में उत्तरोत्तर गठबंधन सरकारें।

चरण IV — प्रभुत्व की वापसी (2014–वर्तमान): BJP ने 2014 में 282 और 2019 में 303 सीटें अकेले जीतीं — 1984 के बाद पहला एकल-दल बहुमत। किंतु 2024 में BJP ने केवल 240 सीटें जीतीं (NDA: 293), TDP और JDU के साथ गठबंधन की गतिकी पुनः लागू।

यह विकास भारत की जनसांख्यिकीय और संघीय जटिलता को दर्शाता है — कोई स्थायी वर्चस्व नहीं, केवल एकत्रीकरण और विखंडन के चक्र।


Q6 (5 अंक — 50 शब्द): पूर्व-चुनाव गठबंधन और चुनाव-पश्चात् गठबंधन में अंतर बताइए — भारतीय उदाहरण सहित।

आदर्श उत्तर:

पूर्व-चुनाव गठबंधन: चुनाव से पहले गठबंधन की घोषणा, सीट-साझेदारी और संयुक्त प्रचार। यदि विजयी हों तो पूर्व-सहमत मंच पर सरकार बनाते हैं। उदाहरण: 2024 Lok Sabha में BJP-नेतृत्व NDA और Congress-नेतृत्व INDIA Alliance। चुनाव-पश्चात् गठबंधन: पूर्व-चुनाव प्रतिबद्धता के बिना चुनाव परिणामों के बाद दल एकजुट होते हैं। उदाहरण: United Front सरकारें (1996–98) — Congress के बाहरी समर्थन से त्रिशंकु संसद के बाद गठित। दोनों प्रकारों में Common Minimum Programme (CMP) सामान्यतः शासन का आधार दस्तावेज होता है।