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राजव्यवस्था, शासन एवं समसामयिकी

संभावित प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, न्यायिक समीक्षा, न्यायिक सक्रियता, आभासी/ई-अदालतें

पेपर III · इकाई 1 अनुभाग 10 / 12 0 PYQ 27 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

संभावित प्रश्न एवं आदर्श उत्तर

Q1 (5 अंक — 50 शब्द): न्यायिक समीक्षा क्या है? भारत में इसका संवैधानिक आधार बताइए।

आदर्श उत्तर:

न्यायिक समीक्षा न्यायालयों की विधायी अधिनियमों और कार्यकारी आदेशों की संवैधानिक वैधता परखने और संविधान से असंगत होने पर उन्हें निरस्त करने की शक्ति है। संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 13 (मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले कानून शून्य), अनुच्छेद 32/226 (रिट अधिकारिता), और अनुच्छेद 131–136 (अपीलीय अधिकारिता)। Kesavananda Bharati (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक समीक्षा को मूल संरचना का भाग घोषित किया — यहाँ तक कि संवैधानिक संशोधन भी इसे हटा नहीं सकते।


Q2 (5 अंक — 50 शब्द): अनुच्छेद 32 के तहत पाँच रिट कौन सी हैं? उनके नाम और अर्थ लिखिए।

आदर्श उत्तर:

अनुच्छेद 32 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय पाँच रिट जारी करता है: (1) Habeas Corpus — बंदी को न्यायालय में प्रस्तुत करो (अवैध हिरासत से सुरक्षा); (2) Mandamus — लोक अधिकारी को कानूनी कर्तव्य पालन का आदेश; (3) Certiorari — अवर न्यायाधिकरण/न्यायालय के आदेश को अपास्त करो; (4) Prohibition — अवर न्यायाधिकरण को अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाने से रोको; (5) Quo Warranto — किसी व्यक्ति के सार्वजनिक पद धारण के अधिकार को चुनौती दो।


Q3 (5 अंक — 50 शब्द): भारत की ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना (चरण III) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

आदर्श उत्तर:

भारत की ई-कोर्ट मिशन चरण III (2023–2027), ₹7,210 करोड़ के बजट के साथ, कागज़रहित कार्यवाही के साथ डिजिटल कोर्ट बनाने, वर्चुअल सुनवाई अवसंरचना विस्तारित करने और पुलिस (CCTNS), न्यायालय, जेल, अभियोजन और फोरेंसिक को जोड़ने वाली अंतर-संचालनीय आपराधिक न्याय प्रणाली (ICJS) लागू करने का लक्ष्य रखती है। मुख्य विशेषताएँ: AI-सहायक केस प्रबंधन, बहुभाषी न्यायालय इंटरफेस और जेलों तक जमानत/स्थगन आदेश के त्वरित प्रेषण के लिए FASTER प्रणाली।


Q4 (10 अंक — 150 शब्द): भारतीय संदर्भ में न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिक्रमण की अवधारणा की समालोचनात्मक परीक्षा कीजिए।

आदर्श उत्तर:

न्यायिक सक्रियता अधिकार संरक्षण और शासन दायित्वों के प्रवर्तन के लिए संविधान की सक्रिय व्याख्या है — विशेषकर जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से। न्यायमूर्ति P.N. Bhagwati और V.R. Krishna Iyer ने 1970 के दशक में PIL का विकास किया, जिससे कोई भी नागरिक हाशिए पर रहने वालों के अधिकारों के लिए याचिका दाखिल कर सके। ऐतिहासिक परिणाम: Vishakha दिशानिर्देश (1997) कार्यस्थल यौन उत्पीड़न पर, M.C. Mehta पर्यावरण आदेश, Hussainara Khatoon (1979) में शीघ्र सुनवाई के अधिकार की मान्यता, PUCL v. UoI में मध्याह्न भोजन योजना आदेशित। इन हस्तक्षेपों ने शासन रिक्तियों को भरा और वंचितों को आवाज़ दी।

न्यायिक अतिक्रमण तब होता है जब न्यायालय विधायी या कार्यकारी क्षेत्र में प्रवेश करते हैं — कानूनी समर्थन के बिना नीतिगत निर्देश, प्रशासनिक निर्णयों का सूक्ष्म प्रबंधन, या निर्वाचित संस्थाओं के चुनाव करना। आलोचना के उदाहरण: BCCI पुनर्गठन आदेश (Lodha समिति), राजमार्ग शराब प्रतिबंध, न्यायालयों द्वारा विशिष्ट सरकारी नियुक्ति आदेश। यह शक्ति पृथक्करण संबंधी चिंताएँ उठाता है।

संवैधानिक संतुलन: परीक्षण यह है कि न्यायालय संविधान/कानून लागू कर रहा है या नई नीति बना रहा है। भारत के 80,000 लंबित सर्वोच्च न्यायालय मामले और कुल 4.4 करोड़ लंबित मामले भी सक्रियतावादी विस्तार से अधिभार के प्रश्न उठाते हैं। कार्यवाही ज्ञापन और न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता सुधार वर्तमान संस्थागत तनाव के केंद्र हैं।


Q5 (10 अंक — 150 शब्द): भारत में कॉलेजियम प्रणाली के विकास और NJAC विवाद की विवेचना कीजिए।

आदर्श उत्तर:

भारत की कॉलेजियम प्रणाली तीन न्यायाधीश मामलों से विकसित हुई। S.P. Gupta (1982) में सर्वोच्च न्यायालय ने नियुक्तियों में कार्यपालिका की प्रधानता दी। SCAORA v. UoI (1993) ने इसे उलट दिया — अनुच्छेद 124(2) के अंतर्गत "परामर्श" का अर्थ "सहमति" है, CJI की सिफारिश बाध्यकारी। राष्ट्रपति संदर्भ (1998) ने कॉलेजियम को CJI + 4 वरिष्ठतम सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश तक विस्तारित किया।

99वाँ संवैधानिक संशोधन (2014) ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) बनाया — एक छह-सदस्यीय निकाय जिसमें विधि मंत्री और दो प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल थे — कॉलेजियम की जगह। SCAORA v. UoI (2015) में पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 से NJAC को न्यायिक स्वतंत्रता (मूल संरचना) का उल्लंघन मानते हुए निरस्त किया। बहुमत ने माना कि कार्यपालिका की उपस्थिति से न्यायिक और कार्यकारी शक्ति का पृथक्करण बाधित हुआ।

कॉलेजियम की आलोचना: अपारदर्शी रूप से कार्य; चयन या अस्वीकृति के लिए कोई प्रकाशित मानदंड नहीं; "अंकल जज" घटना (कॉलेजियम सदस्यों से संबंध रखने वाले न्यायाधीशों की नियुक्ति); सर्वोच्च और उच्च न्यायालय कॉलेजियमों में असंगति। नियुक्तियों में अधिक पारदर्शिता के लिए कार्यवाही ज्ञापन 2016 से बिना समाधान के वार्ता में है।

सुधार मार्ग: कार्यपालिका हस्तक्षेप के बिना पारदर्शिता — कॉलेजियम के निर्णयों और अस्वीकृतियों के कारण प्रकाशित करना, स्वतंत्र सचिवालय और नियुक्ति के लिए निश्चित समय-सीमा।


Q6 (5 अंक — 50 शब्द): राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) क्या है? इसका महत्त्व बताइए।

आदर्श उत्तर:

राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है जो सभी जिला और अधीनस्थ न्यायालयों — 18,735+ न्यायालय प्रतिष्ठानों — में दर्ज, निर्णीत और लंबित मामलों का वास्तविक समय डेटा प्रदान करता है। नागरिक केस स्थिति और तारीखें ट्रैक कर सकते हैं। 2025 तक यह ~4.4 करोड़ लंबित मामले दर्शाता है। महत्त्व: डेटा-आधारित न्यायिक प्रशासन, जवाबदेही, न्यायालय/न्यायाधीश/मामला-प्रकार के अनुसार लंबित मामलों के पैटर्न की पहचान सक्षम करता है और ई-कोर्ट चरण III के अंतर्गत लक्षित सुधारों का समर्थन करता है।