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न्यायिक समीक्षा
4.1 अवधारणा और संवैधानिक आधार
न्यायिक समीक्षा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की किसी विधायी अधिनियम या कार्यकारी कार्रवाई की संवैधानिक वैधता परखने और संविधान के उल्लंघन पर उसे ultra vires (शक्ति-बाह्य) घोषित करने की शक्ति है।
संवैधानिक आधार:
- अनुच्छेद 13: मौलिक अधिकारों के असंगत या हनन करने वाले कानून शून्य होंगे; न्यायालय इसे लागू करते हैं
- अनुच्छेद 32 और 226: रिट अधिकारिता में संवैधानिकता की समीक्षा की शक्ति अंतर्निहित है
- अनुच्छेद 131–136: अपीलीय अधिकारिता में संवैधानिकता की जाँच शामिल है
भारत संवैधानिक व्याख्या में "न्यायिक सर्वोच्चता" का अनुसरण करता है — जो संविधान का अर्थ है उस पर सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय होता है, न कि ब्रिटेन के संसदीय संप्रभुता मॉडल की तरह।
4.2 क्षेत्र: क्या समीक्षा के अधीन है
न्यायिक समीक्षा के अधीन:
- केन्द्रीय और राज्य कानूनों की संवैधानिक वैधता
- संवैधानिक संशोधनों की वैधता (Kesavananda के बाद — मूल संरचना सिद्धांत लागू)
- कार्यकारी आदेशों और सरकारी अधिसूचनाओं की वैधता
- मनमानेपन के आधार पर विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग (Maneka Gandhi सिद्धांत)
सामान्यतः समीक्षा के अधीन नहीं:
- नौवीं अनुसूची के मामले — किंतु I.R. Coelho v. State of Tamil Nadu (2007) ने माना कि नौवीं अनुसूची के कानूनों की भी समीक्षा हो सकती है यदि वे मूल संरचना का उल्लंघन करें
- अनुच्छेद 356, 352 के अंतर्गत राष्ट्रपति की संतुष्टि — किंतु S.R. Bommai v. UoI (1994) ने राष्ट्रपति शासन को समीक्षा के दायरे में लाया
- राजनीतिक प्रश्न — न्यायालय सामान्यतः विशुद्ध राजनीतिक विवादों से दूर रहते हैं
4.3 न्यायिक समीक्षा के आधार
- विधायी सक्षमता का अभाव — किसी ऐसे विषय पर बनाया गया कानून जो संसद/राज्य विधानमंडल की सूची से बाहर है
- मौलिक अधिकारों का उल्लंघन — भाग III के अंतर्गत
- अन्य संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन — जैसे धन विधेयक प्रक्रिया का पालन न करना
- स्पष्ट मनमानापन — विस्तारित अनुच्छेद 14 सिद्धांत के अंतर्गत (Shayara Bano 2017 के बाद)
- मूल संरचना का उल्लंघन — संवैधानिक संशोधनों पर लागू
