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संभावित प्रश्न एवं उत्तर
Q1 (5 अंक — 50 शब्द): संवैधानिक नैतिकता क्या है? सर्वोच्च न्यायालय ने हालिया मामलों में इसे कैसे लागू किया?
आदर्श उत्तर:
संवैधानिक नैतिकता — डॉ. अम्बेडकर की अवधारणा — का अर्थ है लोकप्रिय (बहुसंख्यक) मानदंडों की अपेक्षा संवैधानिक मूल्यों — लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, व्यक्तिगत अधिकारों, संस्थागत प्रक्रियाओं — का पालन। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे Navtej Singh Johar (2018) में सार्वजनिक विरोध के बावजूद सहमति समलैंगिकता को अपराध मुक्त करने में, और Sabarimala (2018) में धार्मिक रीति के बावजूद महिलाओं के मंदिर प्रवेश हेतु लागू किया। संवैधानिक नैतिकता बहुमत की अतिक्रमण से अल्पसंख्यकों की रक्षा करती है।
(55 शब्द)
Q2 (5 अंक — 50 शब्द): परिवर्तनकारी संविधानवाद और भारत के लिए इसका महत्व समझाएं।
आदर्श उत्तर:
परिवर्तनकारी संविधानवाद की मान्यता है कि संविधान स्थिर नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का साधन है — जाति, लिंग और वर्ग की पदानुक्रमों को तोड़ने का। भारत के संविधान को, प्रस्तावना के समानता और गरिमा के लक्ष्यों तथा Article 21 (जीवन का अधिकार) की व्यापक व्याख्या के माध्यम से, सामाजिक परिवर्तन को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाने वाले के रूप में पढ़ा गया है। न्यायमूर्ति D.Y. Chandrachud इसके प्रमुख न्यायिक प्रवर्तक हैं।
(54 शब्द)
Q3 (5 अंक — 50 शब्द): K.S. Puttaswamy मामले (2017) में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या निर्धारित किया?
आदर्श उत्तर:
K.S. Puttaswamy बनाम Union of India (2017) में, सर्वसम्मति से 9-न्यायाधीशों की पीठ ने Article 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया। इसने M.P. Sharma (1954) और Kharak Singh (1963) को रद्द किया। निजता में सूचनात्मक निजता, निर्णयात्मक स्वायत्तता और शारीरिक अखंडता शामिल है। इस निर्णय ने Digital Personal Data Protection Act 2023 को प्रेरित किया और Navtej Johar निर्णय को आकार दिया।
(56 शब्द)
Q4 (10 अंक — 150 शब्द): हालिया निर्णयों में संवैधानिक नैतिकता पर सर्वोच्च न्यायालय के दृष्टिकोण का आलोचनात्मक विश्लेषण करें। क्या न्यायालय सामाजिक अभियंत्रण के क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहा है?
आदर्श उत्तर:
संवैधानिक नैतिकता — लोकप्रिय भावना की अपेक्षा संवैधानिक मूल्यों का पालन — 2017 से भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र का निर्धारक सिद्धांत बन गई है। Navtej Singh Johar (2018) (सहमति समलैंगिकता को अपराध मुक्त करना), Sabarimala (2018) (महिलाओं का मंदिर प्रवेश), और Shayara Bano (2017) (तत्काल तीन तलाक रद्द) में सर्वोच्च न्यायालय का संवैधानिक नैतिकता का उपयोग एक सुसंगत प्रतिरूप दर्शाता है: बहुसंख्यक सामाजिक मानदंडों से अल्पसंख्यकों की संवैधानिक रक्षा।
आलोचक तर्क देते हैं कि यह न्यायिक अतिक्रमण है — न्यायालय अपनी सामाजिक दृष्टि को निर्वाचित विधायिकाओं से ऊपर रखता है। अम्बेडकर की अंतर्दृष्टि में निहित प्रति-तर्क यह है कि संवैधानिक लोकतंत्र के लिए बहुसंख्यकवाद से अधिक की आवश्यकता है: सामूहिक दबाव से व्यक्ति की संस्थागत सुरक्षा चाहिए। संविधान सभा ने स्वतंत्र न्यायपालिका को यही जांच करने के लिए बनाया था।
संवैधानिक नैतिकता की सीमाएं Supriyo (2023) में दिखने लगी हैं, जहां उसी न्यायालय ने समलैंगिक विवाह पर संसद का इंतजार किया — सुझाव देते हुए कि जब मुद्दे में सक्रिय नीति निर्माण (न केवल असंवैधानिक प्रतिबंध हटाना) शामिल हो तो न्यायालय खुद को सीमित करता है। यह संतुलित दृष्टिकोण — प्रतिबंध रद्द करना, हक पर स्थगन — न्यायालय के टिकाऊ सिद्धांत का प्रतिनिधित्व कर सकता है।
(165 शब्द)
Q5 (5 अंक — 50 शब्द): IPC 1860 की तुलना में Bharatiya Nyaya Sanhita 2023 में क्या मुख्य परिवर्तन हुए?
आदर्श उत्तर:
Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS) 2023, जिसने 1 जुलाई 2024 से IPC 1860 का स्थान लिया, में: (i) आतंकवाद और संगठित अपराध पर विशेष प्रावधान; (ii) राजद्रोह (धारा 124A IPC) को धारा 152 से बदला — भारत की संप्रभुता और अखंडता के विरुद्ध कृत्यों को निशाना बनाता है; (iii) महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों को सुदृढ़ किया; (iv) मामूली अपराधों के लिए सामुदायिक सेवा दंड शामिल। इसने IPC की संरचना बनाए रखी किंतु भाषा को भारतीय संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप बनाया।
(57 शब्द)
Q6 (5 अंक — 50 शब्द): Citizenship Amendment Act 2019 क्या है और यह संवैधानिक रूप से विवादास्पद क्यों है?
आदर्श उत्तर:
CAA 2019 अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले धार्मिक उत्पीड़न झेलकर भारत आए गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई) को शीघ्र नागरिकता प्रदान करता है। संवैधानिक विवाद: आलोचकों का कहना है यह धर्म के आधार पर भेदभाव करता है, Article 14 (कानून के समक्ष समानता) का उल्लंघन करता है। सरकार इसे उपचारात्मक बताती है — विशेष धर्मतांत्रिक देशों से प्रताड़ित अल्पसंख्यकों की रक्षा। नियम मार्च 2024 में अधिसूचित; सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं लंबित।
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