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संभावित प्रश्न एवं आदर्श उत्तर
प्र1 (5 अंक — 50 शब्द): मौद्रिक नीति समिति (MPC) क्या है? इसकी संरचना और मुद्रास्फीति लक्ष्य बताइए।
आदर्श उत्तर:
MPC RBI अधिनियम 1934 (संशोधित 2016) के तहत बहुमत से रेपो दर तय करने हेतु गठित। संरचना: 6 सदस्य — 3 RBI से (गवर्नर अध्यक्ष, उपगवर्नर, कार्यकारी निदेशक) + 3 सरकार-मनोनीत (4-वर्षीय कार्यकाल)। वर्ष में 6 बार बैठक। अधिदेश: CPI मुद्रास्फीति 4% ± 2% (2–6% सहिष्णुता बैंड)। यदि CPI लगातार 3 तिमाही 6% से अधिक रहे, RBI को सरकार को रिपोर्ट देनी होगी।
प्र2 (5 अंक — 50 शब्द): CRR और SLR में अंतर बताइए। इनकी वर्तमान दर क्या है?
आदर्श उत्तर:
CRR (नकद आरक्षित अनुपात): बैंक जमाराशि का वह अनुपात जो बैंकों को नकद के रूप में RBI के पास रखना होता है — वर्तमान 4%। CRR शेष पर कोई ब्याज नहीं मिलता। इसका उद्देश्य तरलता नियंत्रण है। SLR (वैधानिक तरलता अनुपात): जमाराशि का वह अनुपात जो तरल संपत्तियों (G-Secs, नकद, स्वीकृत सोना) में रखना होता है — वर्तमान 18%। SLR संपत्तियों पर ब्याज मिलता है। CRR/SLR वृद्धि मुद्रा आपूर्ति घटाती है (संकुचनकारी); कटौती बढ़ाती है।
प्र3 (5 अंक — 50 शब्द): IBC 2016 क्या है? इसकी मुख्य विशेषताएँ बताइए।
आदर्श उत्तर:
IBC 2016 (दिवाला और दिवालियापन संहिता) भारत का ऐतिहासिक वित्तीय सुधार है जो समय-सीमित कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रदान करता है। विशेषताएँ: (1) 180 दिन की समाधान खिड़की (270 दिन तक विस्तार) — कड़ी समय-सीमा से देरी समाप्त; (2) लेनदार-नियंत्रित प्रक्रिया — ऋणदाता समिति (CoC) समाधान योजनाएँ अनुमोदित करती है; (3) NCLT अधिनिर्णय प्राधिकरण; (4) 12 अतिव्यापी कानून प्रतिस्थापित; (5) वसूली उपलब्धि: लेनदारों को ₹3.3 लाख करोड़ (2016–2024)।
प्र4 (5 अंक — 50 शब्द): डिजिटल रुपया क्या है? यह UPI से कैसे भिन्न है?
आदर्श उत्तर:
डिजिटल रुपया (e-Rs) भारत की केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) है — RBI द्वारा प्रत्यक्ष जारी संप्रभु डिजिटल मुद्रा (RBI की देनदारी)। नवंबर 2022 (थोक) और दिसंबर 2022 (खुदरा) से पायलट। UPI — जो बैंक खातों के बीच धन हस्तांतरित करती है — एक भुगतान प्रणाली है, स्वयं धन नहीं। डिजिटल रुपया इलेक्ट्रॉनिक रूप में धन है, डिजिटल बैंकनोट की तरह। ऑफलाइन काम करता है, प्रोग्राम करने योग्य, कोई ब्याज नहीं। अंतर: UPI रेल (अवसंरचना) है; डिजिटल रुपया स्वयं धन है।
प्र5 (10 अंक — 150 शब्द): 1991 से भारत के बैंकिंग क्षेत्र में सुधारों की विवेचना कीजिए। क्या चुनौतियाँ अभी भी शेष हैं?
आदर्श उत्तर:
1991 से भारत के बैंकिंग सुधार किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था में सबसे व्यापक वित्तीय क्षेत्र रूपांतरणों में से एक हैं।
चरण I — नरसिम्हम समिति सुधार (1991-1998):
एम. नरसिम्हम समिति (1991) ने नींव रखी — ब्याज दरों को प्रशासित से बाज़ार-निर्धारित तक उदार बनाना, CRR को 15% और SLR को 38.5% से घटाकर वर्तमान 4%/18% तक। IRAC मानक प्रस्तुत किए, DRT स्थापित और नए निजी बैंक लाइसेंस की सिफारिश — 1994 में HDFC Bank, ICICI Bank, UTI Bank (Axis)। नरसिम्हम समिति II (1998) ने Basel ढाँचा, बैंक समेकन और DFIs के रूपांतरण की सिफारिश की।
चरण II — 2004 के बाद सुधार:
- Basel II और III पूंजी पर्याप्तता कार्यान्वयन (CRAR न्यूनतम 9%)
- Core Banking Solutions (CBS) आधुनिकीकरण — 2010 तक सभी PSBs CBS पर
- वित्तीय समावेशन — बुनियादी बचत बैंक जमा खाते (BSBDA)
- PSL मानक परिष्कृत; MSME, सस्ता आवास जोड़ा
चरण III — 2014 के बाद संरचनात्मक सुधार:
- IBC 2016: समय-सीमित दिवाला — ₹3.3 लाख करोड़ वसूले (2016-24); NPA 11.5% से 2.67% (सितंबर 2024) हुआ
- PSB विलय: 27 PSBs → मेगा-विलय से 12; वैश्विक पैमाने वाले बड़े बैंक
- विभेदित बैंकिंग: लघु वित्त बैंक (12) और भुगतान बैंक (6) — बहिष्कृत वर्गों की सेवा
- डिजिटल भुगतान: UPI, IMPS, RuPay, FASTag — भारत 50%+ वैश्विक वास्तविक-समय भुगतान संसाधित
- MPC ढाँचा (2016): पारदर्शी, नियम-आधारित मौद्रिक नीति
- PSB पुनर्पूंजीकरण: ₹3.12 लाख करोड़ (2015-21)
शेष चुनौतियाँ:
- सरकारी स्वामित्व प्रभुत्व: PSBs अभी भी 60%+ बैंकिंग संपत्तियाँ — शासन और राजनीतिक हस्तक्षेप जारी
- ऋण प्रवेश: ऋण-GDP अनुपात ~57% — चीन के 175% या वैश्विक औसत 100% से कम
- NBFC कमज़ोरी: IL&FS (2018) ने छाया बैंकिंग से प्रणालीगत जोखिम उजागर किए
- साइबर सुरक्षा: बढ़ती धोखाधड़ी — FY2023-24 में डिजिटल बैंकिंग धोखाधड़ी ₹13,900 करोड़ से अधिक
- कृषि ऋण तनाव: ऋण माफी और कृषि ऋण NPA संरचनात्मक समस्याएँ
प्र6 (10 अंक — 150 शब्द): भारत की बैंकिंग प्रणाली के नियामक और पर्यवेक्षक के रूप में RBI की भूमिका समझाइए।
आदर्श उत्तर:
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), 1935 में स्थापित और 1949 में राष्ट्रीयकृत, भारत का शीर्ष मौद्रिक और बैंकिंग प्राधिकरण है। इसकी नियामक और पर्यवेक्षी भूमिका बहुआयामी है।
नियामक शक्तियाँ (बैंकिंग विनियमन अधिनियम 1949):
RBI सभी बैंकिंग संस्थाओं के प्रवेश, निकास, पूंजी पर्याप्तता और व्यावसायिक आचरण को नियंत्रित करता है:
- लाइसेंसिंग: बैंकिंग लाइसेंस प्रदान करना और रद्द करना — कोई बैंक RBI लाइसेंस के बिना संचालित नहीं हो सकता
- पूंजी पर्याप्तता: न्यूनतम 9% CRAR अनिवार्य (Basel III के 8% से ऊपर); अतिरिक्त बफर — पूंजी संरक्षण बफर (2.5%), प्रतिचक्रीय पूंजी बफर
- एक्सपोज़र मानक: Large Exposure Framework — एकल उधारकर्ता/समूह को Tier 1 पूंजी के 25% से अधिक नहीं; एकाग्रता जोखिम रोकता है
- उचित मानदंड: बैंकों के निदेशकों और प्रमुख प्रबंधन को सत्यनिष्ठा और योग्यता मानक पूरे करने होंगे; RBI निदेशकों को हटा सकता है
- ब्याज दर मार्गदर्शन: जमा/ऋण दरें बाज़ार-निर्धारित हैं लेकिन RBI खुदरा और MSME ऋणों के लिए EBLR (रेपो-लिंक्ड) अनिवार्य करता है
पर्यवेक्षी तंत्र:
- वार्षिक वित्तीय निरीक्षण (AFI): RBI के पर्यवेक्षण विभाग द्वारा प्रत्येक अनुसूचित बैंक का वार्षिक ऑन-साइट निरीक्षण; परिसंपत्ति गुणवत्ता, पूंजी, तरलता, प्रबंधन, आय का मूल्यांकन
- ऑफ-साइट निगरानी और निगरानी (OSMOS): बैंकों द्वारा प्रस्तुत वित्तीय रिटर्न की निरंतर निगरानी; तनाव के लिए शीघ्र चेतावनी प्रणाली
- PCA ढाँचा: NPA अनुपात, पूंजी पर्याप्तता या RoA पर सीमाएँ तोड़ने पर बैंकों पर लागू — बैंक ठीक होने तक लाभांश, ऋण, शाखा विस्तार, प्रबंधन पारिश्रमिक पर प्रतिबंध
- कमज़ोर बैंकों का समाधान: RBI परिसमापन हेतु NCLT में आवेदन कर सकता है, स्वैच्छिक विलय आयोजित कर सकता है (Bank of Rajasthan → ICICI), bail-in/bail-out का आयोजन कर सकता है (YES Bank 2020 — SBI नेतृत्व में बचाव)
हालिया नियामक पहल:
- NBFCs के लिए SBR (2021): 4-परत वर्गीकरण — Base/Middle/Upper/Top — आकार और प्रणालीगत महत्व के आधार पर
- संशोधित KYC मानक (2021): वीडियो-आधारित ग्राहक पहचान; Aadhaar-OTP आधारित eKYC
- साइबर सुरक्षा ढाँचा: RBI का IT परीक्षण ढाँचा साइबर सुरक्षा ऑडिट, उल्लंघन रिपोर्टिंग अनिवार्य करता है
