सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन
औद्योगिक क्रांति
3.1 ब्रिटेन में सबसे पहले क्यों?
औद्योगिक क्रांति का उद्गम ब्रिटेन में कई परस्पर जुड़े कारणों से हुआ:
- कृषि क्रांति की पृष्ठभूमि: एनक्लोजर आंदोलन ने ग्रामीण श्रम को शहरों की ओर धकेला; बढ़े हुए खाद्य उत्पादन ने शहरी कार्यबल का समर्थन किया
- कोयला और लोहा: ब्रिटेन विशाल कोयला क्षेत्रों (दक्षिण वेल्स, न्यूकैसल, मिडलैंड्स) और लोहे के भंडारों पर बसा था — औद्योगीकरण की दो प्रमुख कच्ची सामग्री
- औपनिवेशिक बाजार और कच्चा माल: ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत और अमेरिका से कपास आपूर्ति की और निर्मित वस्तुओं के लिए संरक्षित बाजार प्रदान किए
- पूँजी संचय: वाणिज्यिक और बैंकिंग व्यवस्था (बैंक ऑफ इंग्लैंड, 1694) ने निवेश पूँजी उपलब्ध कराई; अटलांटिक व्यापार की संपदा पुनर्निवेश के लिए उपलब्ध थी
- पेटेंट प्रणाली: ब्रिटेन के पेटेंट कानून ने आविष्कारों से लाभ की रक्षा कर आविष्कारकों को प्रोत्साहित किया
- श्रम की उपलब्धता: ग्रामीण विस्थापित मजदूर कारखाना कार्य के लिए उपलब्ध थे
- परिवहन अवसंरचना: नदी-नौवहन, नहर-निर्माण (1760–1800) और बाद में रेलवे ने थोक कच्चे माल के परिवहन को सक्षम बनाया
3.2 प्रमुख आविष्कार
वस्त्र उद्योग
- जॉन के का फ्लाइंग शटल (1733): बुनाई की गति दोगुनी की; तीव्र कताई की माँग उत्पन्न हुई
- जेम्स हार्ग्रीव्स की स्पिनिंग जेनी (1764): एक साथ कई धागे कातती थी (पहले मॉडल में 8 धुरियाँ, बाद में 80+)
- रिचर्ड आर्कराइट का वाटर फ्रेम (1769): जल-चालित कताई यंत्र — कारखाना प्रणाली की नींव
- सैमुएल क्रॉम्पटन का स्पिनिंग म्यूल (1779): जेनी और वाटर फ्रेम का संयोजन — महीन और मजबूत धागा उत्पन्न करता था
- एडमंड कार्टराइट का पावर लूम (1785): यंत्रीकृत बुनाई; भाप शक्ति के साथ मिलकर वस्त्र उद्योग को रूपांतरित किया
भाप शक्ति
- थॉमस न्यूकमेन का भाप इंजन (1712): पहला व्यावहारिक भाप इंजन — खानों से पानी निकालने के लिए उपयोग
- जेम्स वॉट का भाप इंजन (1769): महत्त्वपूर्ण सुधार — पृथक संघनित्र ने इसे औद्योगिक उपयोग के लिए दक्ष बनाया; घूर्णी गति (1782) ने इसे सीधे मशीनरी चलाने में सक्षम बनाया
- 1800 तक: ब्रिटिश कारखानों और खानों में 500+ वॉट इंजन चल रहे थे
- जॉर्ज स्टीफेंसन का रॉकेट इंजन (1829): रेनहिल परीक्षण जीता; रेलवे को व्यावहारिक जन-परिवहन के रूप में स्थापित किया
लोहा और इस्पात
- अब्राहम डार्बी का कोक-प्रगलन (1709): कोयले से बने कोक से लोहा गलाया — चारकोल की बाधा दूर हुई; लोहा उत्पादन व्यापक रूप से बढ़ा
- हेनरी बेसेमर का कन्वर्टर (1856): इस्पात उत्पादन में क्रांति — रेलवे के लिए सस्ते इस्पात का बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हुआ
परिवहन
- नहरें: पहली नहर (ब्रिजवाटर नहर, 1761) ने वर्सले खानों से मैनचेस्टर तक कोयले की लागत 80% घटाई
- रेलवे: लिवरपूल-मैनचेस्टर रेलवे (1830) — पहला अंतर-नगर यात्री रेलवे; 1850 तक ब्रिटेन में 10,000 किमी पटरी
3.3 सामाजिक परिणाम
शहरीकरण
कारखाना-नगर तेजी से बढ़े। मैनचेस्टर (औद्योगिक क्रांति का उद्गम) 1772 में ~25,000 से 1850 में ~3,03,000 तक पहुँचा। परिस्थितियाँ भयावह थीं: भीड़भाड़, प्रदूषण, बीमारी (1831, 1848 की हैजा महामारियाँ) और व्यापक बाल श्रम।
कारखाना प्रणाली और कार्य-परिस्थितियाँ
- 12–16 घंटे का कार्य दिवस सामान्य था
- 5–6 वर्ष की उम्र से बाल श्रम (चिमनी सफाईकर्मी, कोयला खाने)
- फैक्टरी एक्ट (1833): 9 वर्ष से कम बच्चों को वस्त्र कारखानों से वंचित किया; बच्चों के घंटे सीमित किए
- माइन्स एक्ट (1842): महिलाओं और 10 वर्ष से कम लड़कों पर भूमिगत कार्य पर प्रतिबंध
मजदूर वर्ग और ट्रेड यूनियनों का उदय
- लुडाइट (1811–16): कुशल वस्त्र मजदूरों ने नौकरी विस्थापन के भय से मशीनरी तोड़ी
- चार्टिज्म (1838–57): सार्वभौमिक पुरुष मताधिकार, गुप्त मतपत्र और सांसदों के लिए वेतन की माँग करने वाला मजदूर-वर्गीय राजनीतिक आंदोलन
- ट्रेड यूनियनें: कॉम्बिनेशन एक्ट (1799–1800) ने यूनियनों पर रोक लगाई; 1824 में रद्द; ट्रेड्स यूनियन काँग्रेस (TUC) 1868 में स्थापित
पूँजीवाद और समाजवाद
- एडम स्मिथ की राष्ट्रों का धन (1776): अहस्तक्षेप पूँजीवाद; श्रम-विभाजन; बाजार का अदृश्य हाथ
- कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स: कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो (1848) और दास कैपिटल (खंड 1, 1867) — पूँजीवाद के शोषण तंत्र का विश्लेषण; वर्ग-क्रांति की भविष्यवाणी
पर्यावरणीय परिणाम
मैनचेस्टर पहला औद्योगिक नगर और औद्योगीकरण की कीमत का प्रतीक बना। कोयले के धुएँ ने "मटर-सूप" कोहरा उत्पन्न किया। नदियाँ खुले नाले बन गईं।
3.4 विश्व इतिहास पर प्रभाव
नया साम्राज्यवाद (PYQ 2023 संबंध)
औद्योगिक उत्पादन को कच्चे माल और बाजारों की जरूरत थी। इससे अफ्रीका की छीनाझपटी (1880–1900) और एशिया (भारत, चीन) में साम्राज्यवाद तेज हुआ। ब्रिटेन की औद्योगिक श्रेष्ठता ने सैन्य और नौसैनिक वर्चस्व में सीधा अनुवाद किया।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम-विभाजन
उपनिवेशों ने कच्चा माल आपूर्ति किया जबकि औद्योगिक देशों ने निर्मित वस्तुएँ उत्पादित कीं। औपनिवेशिक विश्व अर्थव्यवस्था की यह संरचनात्मक असमानता आज तक बनी है।
भारत पर प्रभाव
ब्रिटिश औद्योगीकरण ने भारत को विऔद्योगीकृत किया। भारतीय सूती वस्त्र (जो कभी विश्व में निर्यात होते थे) सस्ते मैनचेस्टर कपड़े से विस्थापित हुए। भारतीय बुनकर गरीब हुए और भारत निर्माता के बजाय बाजार और आपूर्तिकर्ता बन गया।
