सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन
परिचय एवं संदर्भ
औपनिवेशिक विरोधाभास
19वीं–20वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन आधुनिक भारतीय इतिहास के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बौद्धिक प्रकरणों में से एक हैं। औपनिवेशिक शासन ने एक विरोधाभास उत्पन्न किया: ब्रिटिश सत्ता जहाँ अपमानजनक और शोषणकारी थी, वहीं उसने मुद्रण-यंत्र, अंग्रेज़ी शिक्षा और पश्चिमी उदार विचार भी पेश किए जो भारतीय सुधारकों को अपने समाज की आलोचना के नए साधन दे गए।
भारतीय सुधारकों ने पश्चिमी उदार विचारों से जो तत्त्व ग्रहण किए:
- तर्कशीलता और परंपरा पर बुद्धि की प्रधानता
- व्यक्तिगत अधिकार और कानून के समक्ष समानता
- फ्रांसीसी क्रांति से उद्भूत अवधारणाएँ
सुधार के तीन क्षेत्र
सुधार कार्य तीन परस्पर संबद्ध क्षेत्रों में हुआ:
- धार्मिक सुधार: एकेश्वरवाद बनाम बहुदेववाद/मूर्तिपूजा; हिंदू/मुस्लिम/सिख धार्मिक आचरण की शुद्धि; शास्त्रों की तर्कसंगत व्याख्या।
- सामाजिक सुधार: सती प्रथा उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा, अस्पृश्यता-विरोध, जाति सुधार, बाल विवाह, पर्दा प्रथा।
- बौद्धिक जागृति: तर्कसंगत अन्वेषण, पत्रकारिता, देशी भाषा साहित्य, आधुनिक शिक्षा, पश्चिमी विज्ञान — राष्ट्रवाद की बौद्धिक आधारभूमि का निर्माण।
परीक्षा प्रासंगिकता
RPSC के विगत प्रश्नपत्रों में इस विषय से औसतन 7.4 अंक/वर्ष पूछे जाते हैं — जो विषय 15 (राष्ट्रीय आंदोलन) के बराबर है। 2021 में थियोसोफिकल सोसाइटी पर 10 अंकों का प्रश्न इसी अध्याय में सीधे उत्तरित है। 2023 में शून्य अंक मिलने से यह विषय 2026 की शीर्ष भविष्यवाणी बन जाता है।
