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इतिहास

आर्य समाज एवं उसका महत्त्व

सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन (19वीं–20वीं शताब्दी), बौद्धिक जागृति

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 4 / 12 0 PYQ 32 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

आर्य समाज एवं उसका महत्त्व

3.1 स्वामी दयानंद सरस्वती (1824–1883)

दयानंद सरस्वती (जन्म: मूलशंकर तिवारी, टंकारा, गुजरात) ने मृत्यु और एक आध्यात्मिक गुरु से मुलाकात के बाद गृहस्थ जीवन त्याग दिया। मथुरा में विरजानंद के पास 15 वर्षों तक संस्कृत व्याकरण और वैदिक साहित्य का अध्ययन किया, फिर 10 अप्रैल 1875 को बॉम्बे में आर्य समाज की स्थापना की।

आर्य समाज के मूल सिद्धांत (10 नियम)

  1. ईश्वर ही समस्त सत्य ज्ञान और ज्ञान द्वारा जाने जाने वाले पदार्थों का मूल कारण है।
  2. वेद सब सच्ची विद्याओं के ग्रंथ हैं — प्रत्येक आर्य का परम कर्तव्य है कि उन्हें पढ़े, सुने और सुनाए।
  3. सत्य को ग्रहण करना और असत्य को छोड़ना चाहिए।

प्रमुख स्थितियाँ

  • वेदों की ओर वापसी: वेद अंतिम प्रमाण; अन्य ग्रंथ गौण और त्रुटिपूर्ण हो सकते हैं। यह ब्रह्म समाज से भिन्न था जो वेदीय प्रमाण को अस्वीकार कर बुद्धि को सर्वोच्च मानता था।
  • मूर्ति-विरोध और ब्राह्मण कर्मकांड एकाधिकार का विरोध: मंदिर पूजा, मूर्तिपूजा और महँगे कर्मकांड को वैदिक धर्म का भ्रष्टाचरण बताया; इससे ईश्वर की प्राप्ति सबके लिए सुलभ हुई।
  • जाति-विरोध: आर्य समाज ने जन्म-आधारित वंशानुगत जाति (जाति) को अस्वीकार किया, जबकि गुण और कर्म पर आधारित वैदिक वर्ण को स्वीकार किया।
  • शुद्धि: पुनः धर्मांतरण समारोह — जो इस्लाम या ईसाई धर्म में गए थे, वे हिंदू धर्म में वापस आ सकते थे। इससे 20वीं सदी के प्रारंभ में हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हुआ।
  • गुरुकुल शिक्षा: दयानंद सरस्वती ने गुरुकुल कांगड़ी (हरिद्वार, 1902 में मुंशी राम/स्वामी श्रद्धानंद द्वारा) की स्थापना की — आवासीय वातावरण में संस्कृत और वैदिक विज्ञान की शिक्षा।

3.2 आर्य समाज की राजनीतिक विरासत

आर्य समाज ने अनेक राष्ट्रवादी नेता दिए: लाला लाजपत राय, पंडित मदन मोहन मालवीय (1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना), और स्वामी श्रद्धानंद। इसके समाचार-पत्र दयानंद संदेश और गुरुकुल विद्यालयों ने राष्ट्रवादियों की एक पीढ़ी को शिक्षित किया। पंजाब का आर्य समाज लाला लाजपत राय के राजनीतिक जीवन में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रहा।