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उदारवादी चरण: याचना की राजनीति
2.1 स्थापना और उद्देश्य
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (1829–1912), एक सेवानिवृत्त ICS अधिकारी, की पहल पर दिसंबर 1885 में हुई। ह्यूम ने वायसराय डफरिन से पत्राचार किया — इतिहासकारों में इस बात पर बहस है कि क्या कांग्रेस भारतीय राजनीतिक असंतोष के लिए "सेफ्टी वॉल्व" प्रदान करने के लिए थी (जिसे अधिकांश राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने अस्वीकार किया), या यह एक वास्तविक राष्ट्रवादी पहल थी।
पहला अधिवेशन (28–30 दिसंबर 1885):
- डब्ल्यू.सी. बनर्जी (वोमेश चंद्र बनर्जी) ने अध्यक्षता की; गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज, बॉम्बे में आयोजित
- 72 प्रतिनिधि उपस्थित हुए
- प्रारंभिक माँगें: विधायी परिषदों का विस्तार, सिविल सेवा का भारतीयकरण
- साथ ही सैन्य व्यय में कटौती और भारतीयों के लिए जूरी द्वारा मुकदमे की माँग
2.2 प्रमुख उदारवादी नेता
दादाभाई नौरोजी (1825–1917)
- "भारत के ग्रैंड ओल्ड मैन" कहलाए
- ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए निर्वाचित पहले भारतीय (1892, फिंसबरी सेंट्रल, लिबरल MP के रूप में)
- तीन बार INC अध्यक्ष (1886, 1893, 1906)
- धन-निकासी सिद्धांत विकसित किया; उनकी पुस्तक Poverty and Un-British Rule in India (1901) राष्ट्रवादी अर्थशास्त्र का प्रमुख ग्रंथ बनी
गोपाल कृष्ण गोखले (1866–1915)
- महाराष्ट्र से; INC अध्यक्ष 1905
- सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी (1905) की स्थापना — समाज सेवकों को प्रशिक्षित करने के लिए
- गाँधी के स्वीकृत राजनीतिक गुरु — गाँधी ने अपनी आत्मकथा उन्हें समर्पित की
- संवैधानिक माध्यमों से क्रमिक सुधार के लिए काम किया; मॉर्ले-मिंटो सुधार (1909) को प्रभावित किया
सुरेन्द्रनाथ बनर्जी (1848–1925)
- "राष्ट्रगुरु"; ICS परीक्षा उत्तीर्ण (1869) परंतु नस्लीय आधार पर बर्खास्त
- इंडियन एसोसिएशन (1876) की स्थापना — पहले राजनीतिक संगठनों में से एक
- Bengalee समाचार पत्र के संपादक; पहले राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किए
- बंगाल विभाजन रद्द होने के बाद "उदारवादी" बन गए
बाल गंगाधर तिलक (1856–1920)
- महाराष्ट्र में जन्मे, कानून में प्रशिक्षित; केसरी (मराठी) और Mahratta (अंग्रेजी) के संपादक
- जन-राजनीतिक गोलबंदी के लिए गणेश चतुर्थी (1893) और शिवाजी उत्सव (1895) की स्थापना की
- "भारत के पहले लोकप्रिय नेता" कहलाए (गोखले का वर्णन)
- प्रसिद्ध उद्घोष: "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा"; अंग्रेजों ने दो बार कारावास दिया (1897, 1908)
- नोट: वे मुख्यतः उग्रवादी चरण से संबंधित हैं, पर दोनों चरणों को जोड़ते हैं
2.3 उदारवादी दृष्टिकोण की सीमाएँ और आलोचना
20 वर्षों की संवैधानिक आंदोलनबाजी में उदारवादियों को सीमित ठोस परिणाम मिले। भारतीय परिषद अधिनियम 1892 ने वास्तविक शक्ति के बिना परिषदों का सीमित विस्तार ही दिया। 1905 तक एक नई पीढ़ी के नेताओं ने तर्क दिया कि "भिक्षावृत्ति" (निरंतर याचिका) अपमानजनक और अप्रभावी है। बंगाल का विभाजन (1905) ने उदारवादियों और उग्रवादियों के बीच की खाई को स्पष्ट कर दिया।
