सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन
गाँधीवादी युग
4.1 गाँधी की वापसी और प्रारंभिक सत्याग्रह
मोहनदास करमचंद गाँधी (1869–1948): जन्म पोरबंदर (गुजरात); लंदन में कानून की शिक्षा। उन्होंने 1893–1915 दक्षिण अफ्रीका में अहिंसक प्रतिरोध (सत्याग्रह — "सत्य-बल") विकसित करते हुए बिताए। गोखले के सुझाव पर 1915 में भारत लौटे और एक वर्ष भ्रमण के बाद राजनीति में उतरे।
प्रारंभिक सत्याग्रह (1917–18) — "अभ्यास प्रयोग":
- चंपारण (1917): भारत में पहला सत्याग्रह — नील किसानों की ओर से जिन्हें अपनी 3/20 भूमि पर नील उगाना पड़ता था (तिनकठिया प्रणाली); गाँधी की जाँच से जबरन नील अनुबंध समाप्त हुआ
- अहमदाबाद मिल मजदूर हड़ताल (1918): गाँधी का पहला उपवास — कपड़ा मिल मजदूरों की वेतन वृद्धि की माँग पर; उनकी माँगें पूरी हुईं
- खेड़ा सत्याग्रह (1918): फसल खराब होने पर भू-राजस्व स्थगन की माँग; वल्लभभाई पटेल ने यहाँ पहली बार गाँधी का साथ दिया
4.2 असहयोग आंदोलन (1920–22)
संदर्भ:
- जलियाँवाला बाग हत्याकांड (अप्रैल 1919)
- खिलाफत मुद्दा (अली बंधु)
- सितंबर 1920 के कलकत्ता विशेष अधिवेशन में कांग्रेस-खिलाफत गठबंधन
कार्यक्रम:
- उपाधियों और सम्मानित पदों का त्याग
- विधायी परिषदों का बहिष्कार
- सरकारी शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार
- अदालतों और चुनावों का बहिष्कार
- विदेशी कपड़े का बहिष्कार; मद्य दुकानों पर पिकेटिंग
पैमाना और प्रमुख प्रतिभागी:
- पहले वर्ष में 30,000 गिरफ्तारियाँ
- सुभाष चंद्र बोस आंदोलन में शामिल हुए (ICS की पढ़ाई छोड़कर लौटे)
- सी.आर. दास ने अपनी वकालत छोड़ी
- खिलाफत नेताओं ने मुस्लिम भागीदारी का नेतृत्व किया
चौरी-चौरा कांड (4 फरवरी 1922):
चौरी-चौरा गाँव (गोरखपुर, UP) में प्रदर्शनकारी भीड़ ने एक पुलिस चौकी पर हमला करके उसे जला दिया — 22 पुलिसकर्मी मारे गए। गाँधी ने दो सप्ताह बाद (12 फरवरी 1922) पूरा आंदोलन वापस ले लिया — यह तर्क देते हुए कि अहिंसा का उल्लंघन हुआ। यह निर्णय कई नेताओं (मोतीलाल नेहरू, सुभाष बोस) द्वारा — आंदोलन को उसके चरम पर छोड़ने के रूप में — आलोचित हुआ।
4.3 सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी मार्च (1930–34)
1930 तक की पृष्ठभूमि:
- साइमन कमीशन (1928, पूरी तरह ब्रिटिश, कोई भारतीय नहीं) का बहिष्कार
- नेहरू रिपोर्ट (1928): पहला भारतीय-रचित संवैधानिक प्रस्ताव, पर मुस्लिम लीग ने अस्वीकार किया
- लाहौर कांग्रेस (दिसंबर 1929): पूर्ण स्वराज (संपूर्ण स्वतंत्रता) का उद्घोष
- 26 जनवरी 1930 पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया गया (अब गणतंत्र दिवस)
दांडी मार्च (12 मार्च–5 अप्रैल 1930):
गाँधी ने नमक कर को केंद्र चुना — सार्वभौमिक रूप से लागू, नैतिक रूप से स्पष्ट, सबसे गरीब तक प्रभाव। साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) से दांडी (गुजरात तट) तक 78 अनुयायियों के साथ 240 मील की यात्रा — 5 अप्रैल 1930 को समुद्र जल से नमक बनाया।
- गाँधी 5 मई 1930 को गिरफ्तार
- धरासना नमक कारखाने पर छापा (21 मई 1930): सरोजिनी नायडू और अब्बास तैयबजी के नेतृत्व में; अहिंसक प्रदर्शनकारियों को इस्पात-नोकदार डंडों से पीटा गया — अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर ने कवरेज दी, अंतरराष्ट्रीय आक्रोश फैला
- पेशावर: भारी प्रदर्शन; खान अब्दुल गफ्फार खान की खुदाई खिदमतगार ("ईश्वर के सेवक") — अहिंसक पश्तून आंदोलन
गोलमेज सम्मेलन और समझौता:
- पहला गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1930): कांग्रेस ने बहिष्कार किया; रियासतें और मुस्लिम लीग शामिल हुईं
- गाँधी-इर्विन समझौता (5 मार्च 1931): गाँधी ने सविनय अवज्ञा निलंबित की; इर्विन ने राजनीतिक कैदी रिहा किए, तटीय नमक उत्पादन की अनुमति दी; गाँधी दूसरे गोलमेज सम्मेलन (सितंबर–दिसंबर 1931) में गए पर यह विफल रहा
- सांप्रदायिक पंचाट (अगस्त 1932): रैम्से मैकडोनाल्ड ने अनुसूचित जातियों को पृथक निर्वाचन-मंडल दिया — गाँधी ने मृत्यु-पर्यंत उपवास किया
- पूना समझौता (24 सितंबर 1932): गाँधी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर के बीच सहमति — पृथक निर्वाचन-मंडल की जगह संयुक्त हिंदू निर्वाचन-मंडल में आरक्षित सीटें
4.4 भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
संदर्भ:
- द्वितीय विश्व युद्ध भारत की सीमा तक पहुँच चुका था (जापानी सेना बर्मा-भारत सीमा पर, 1942)
- क्रिप्स मिशन (मार्च–अप्रैल 1942) ने युद्ध के बाद अधिराज्य का दर्जा देने की पेशकश की — तत्काल स्वशासन नहीं
- कांग्रेस ने इसे "डूबते बैंक पर उत्तर-दिनांकित चेक" (नेहरू) कहकर अस्वीकार किया
प्रस्ताव (8 अगस्त 1942):
गोवालिया टैंक मैदान (अब अगस्त क्रांति मैदान), बॉम्बे में AICC की बैठक में कांग्रेस ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पास किया — तत्काल ब्रिटिश वापसी की माँग। गाँधी का नारा: "करो या मरो"।
तत्काल गिरफ्तारी:
प्रस्ताव के कुछ घंटों बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने पूरे कांग्रेस नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया — गाँधी पुणे के बिड़ला हाउस में; नेहरू, पटेल, आज़ाद सब कारावास में। आंदोलन नेतृत्वहीन हो गया।
अरुणा आसफ़ अली (1909–1996):
- 9 अगस्त 1942 को गोवालिया टैंक मैदान पर कांग्रेस का झंडा फहराया — 1942 विद्रोह का प्रतीक बनीं
- तीन वर्षों तक भूमिगत रहीं, गतिविधियाँ समन्वित करती रहीं
- भारत रत्न (1997, मरणोपरांत); "भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका" कहलाईं
- दिल्ली की पहली महिला महापौर (1958) भी रहीं
दमन का पैमाना:
- लगभग 1 लाख लोग गिरफ्तार
- पुलिस गोलीबारी में 1,028 मारे गए
- 3,200 पुलिस थाने, 749 सरकारी इमारतें, 88 रेलवे स्टेशन, 231 टेलीग्राफ दफ्तर क्षतिग्रस्त या नष्ट
- 1942 के अंत तक आंदोलन प्रभावी रूप से दबा दिया गया, पर इसने दीर्घकालिक ब्रिटिश शासन की असंभवता सिद्ध की
