सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन
संभावित प्रश्न एवं उत्तर
प्र.1 (5 अंक — 50 शब्द): भारत छोड़ो आंदोलन में अरुणा आसफ़ अली का योगदान क्या था?
आदर्श उत्तर:
अरुणा आसफ़ अली (1909–1996) भारत छोड़ो आंदोलन (1942) की एक अहम हस्ती थीं। 9 अगस्त 1942 को पूरी कांग्रेस नेतृत्व के गिरफ्तार होने के बाद वे बॉम्बे के गोवालिया टैंक मैदान में पहुँचीं और कांग्रेस का झंडा फहराया, जो निरंतर प्रतिरोध का प्रतीक बना। वे तीन वर्षों तक भूमिगत रहीं और देशभर में गतिविधियाँ समन्वित करती रहीं। उन्हें "1942 आंदोलन की नायिका" की उपाधि मिली और (मरणोपरांत) 1997 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
प्र.2 (5 अंक — 50 शब्द): चौरी-चौरा कांड क्या था और गाँधी ने असहयोग आंदोलन क्यों वापस लिया?
आदर्श उत्तर:
4 फ़रवरी 1922 को चौरी-चौरा गाँव (गोरखपुर, UP) में प्रदर्शनकारी भीड़ ने एक पुलिस चौकी पर हमला करके उसे जला दिया, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। गाँधी को लगा कि अहिंसा के मूल सिद्धांत का उल्लंघन हुआ है, इसलिए उन्होंने 12 फ़रवरी 1922 को पूरे असहयोग आंदोलन को — उसके चरम पर होते हुए भी — वापस ले लिया। उनके इस निर्णय पर विवाद हुआ: कई नेताओं (नेहरू, सुभाष बोस) को लगा कि उन्होंने आंदोलन समय से पहले ही छोड़ दिया।
प्र.3 (5 अंक — 50 शब्द): बाल-पाल-लाल त्रिमूर्ति का नाम बताओ और राष्ट्रीय आंदोलन के उग्रवादी चरण में उनके योगदान की चर्चा करो।
आदर्श उत्तर:
बाल (बाल गंगाधर तिलक, महाराष्ट्र): "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है"; जन-गोलबंदी के लिए गणेश और शिवाजी उत्सवों का उपयोग; केसरी के संपादक। पाल (बिपिन चंद्र पाल, बंगाल): "निष्क्रिय प्रतिरोध" के अग्रदूत; New India के संपादक; तिलक के विरुद्ध गवाही देने से इनकार। लाल (लाला लाजपत राय, पंजाब): "पंजाब केसरी"; Simon Commission विरोध; पुलिस की लाठी से लगी चोटों से 17 नवंबर 1928 को निधन। तीनों ने कांग्रेस को याचना-निकाय से जन-आंदोलन में बदला।
प्र.4 (10 अंक — 150 शब्द): सविनय अवज्ञा आंदोलन के संदर्भ में गाँधी के दांडी मार्च के महत्त्व का मूल्यांकन करो।
आदर्श उत्तर:
गाँधी की दांडी यात्रा (12 मार्च–5 अप्रैल 1930) केवल नमक कर का विरोध नहीं थी — यह राजनीतिक संचार की एक अद्वितीय कृति थी, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को सच्चे जन-आंदोलन में बदल दिया।
नमक का रणनीतिक चयन: गाँधी ने नमक कर को जानबूझकर चुना — यह सार्वभौमिक था (हर भारतीय नमक इस्तेमाल करता था), नैतिक रूप से निर्विवाद (एक आवश्यक वस्तु पर कर की अन्यायपूर्णता से कोई इनकार नहीं कर सकता), और इसमें हिंसा की कोई गुंजाइश नहीं थी। नमक बनाना एक साथ ग़ैरकानूनी और पूरी तरह शांतिपूर्ण था।
यात्रा स्वयं: साबरमती आश्रम से दांडी तक 240 मील की 24 दिनों की यात्रा में 78 अनुयायियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्सुकता जगाई। मार्ग का हर गाँव राजनीतिक सभा बन गया। BBC और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने व्यापक कवरेज दी — भारत के संघर्ष को विश्व का ध्यान मिला।
परिणाम: गाँधी की गिरफ़्तारी (5 मई 1930) ने देशव्यापी सविनय अवज्ञा को भड़का दिया — कारखाना मज़दूर, व्यापारी, किसान और महिलाएँ सभी इसमें शामिल हुए। धरासना नमक कारखाने पर छापा (मई 1930), जिसका नेतृत्व सरोजिनी नायडू ने किया, अंतरराष्ट्रीय आक्रोश का कारण बना। कुछ ही हफ़्तों में 60,000 भारतीय गिरफ़्तार हो गए।
संरचनात्मक महत्त्व: इस आंदोलन ने एक साथ तीन बातें सिद्ध कीं: (क) अहिंसक जन-सविनय अवज्ञा ब्रिटिश प्रशासन को पंगु बना सकती है; (ख) महिलाएँ राजनीतिक कार्रवाई में पूर्ण समान भागीदार हो सकती हैं; (ग) स्वतंत्रता आंदोलन की जड़ें जन-सामान्य में हैं, न केवल अभिजात वर्ग में। गाँधी-इर्विन समझौता (मार्च 1931) ब्रिटेन की यह स्वीकृति थी कि संवैधानिक रास्तों से अकेले भारतीय राष्ट्रवाद को नहीं सँभाला जा सकता।
प्र.5 (10 अंक — 150 शब्द): क्रांतिकारी धारा (भगत सिंह, INA) ने भारत की स्वतंत्रता में कैसे योगदान दिया? गाँधी के अहिंसक दृष्टिकोण से यह किस प्रकार भिन्न था?
आदर्श उत्तर:
क्रांतिकारी धारा ने स्वतंत्रता का एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया — जन-सविनय अवज्ञा की जगह प्रत्यक्ष सशस्त्र प्रतिरोध — और भारत की स्वतंत्रता में इसका योगदान अप्रत्यक्ष, किंतु महत्त्वपूर्ण था।
भगत सिंह और HSRA: भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फाँसी (23 मार्च 1931) ने शहीदों की एक पीढ़ी तैयार की जिसने जन-समर्थन को प्रेरित किया। उनकी समाजवादी विचारधारा — भगत सिंह के जेल-लेखन और HSRA के घोषणापत्र में व्यक्त — ने स्वतंत्रता आंदोलन के वैचारिक आधार को सामाजिक-आर्थिक न्याय तक विस्तृत किया। केंद्रीय विधान सभा में बम (1929) — जानबूझकर अघातक — एक ऐसे मुकदमे को मजबूर करने के लिए था जो एक राजनीतिक मंच बना।
INA (सुभाष बोस, 1943–45): INA के इम्फाल-कोहिमा अभियान (1944) और INA मुकदमों ने ब्रिटिश निर्णय-निर्माण पर निर्णायक प्रभाव डाला। Royal Indian Navy और Army के भारतीय सैनिक — जिनमें से कई INA के अनुभवियों को जानते थे — अब उपनिवेशी नियंत्रण के विश्वसनीय हथियार नहीं रहे। Royal Indian Navy विद्रोह (फ़रवरी 1946) सीधे INA मुकदमों की राष्ट्रवादी लहर से उपजा।
गाँधी से अंतर: गाँधी का सत्याग्रह नैतिक दबाव द्वारा विरोधी को रूपांतरित करना चाहता था; क्रांतिकारियों का लक्ष्य था औपनिवेशिक शासन को इतना महँगा बनाना कि वह टिक न सके। गाँधी ने भगत सिंह के तरीकों से दूरी बनाई, पर उनके बलिदान को "साहसी" माना। दोनों धाराएँ एक साथ काम करते हुए एक घेरा बनाती थीं — अहिंसक आंदोलन ने ब्रिटेन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमज़ोर किया; क्रांतिकारी/INA धारा ने सैन्य नियंत्रण के साधन को कमज़ोर किया।
प्र.6 (5 अंक — 50 शब्द): जलियाँवाला बाग हत्याकांड और इसके राजनीतिक परिणामों पर एक टिप्पणी लिखो।
आदर्श उत्तर:
13 अप्रैल 1919 को ब्रिगेडियर डायर ने अमृतसर के जलियाँवाला बाग में इकट्ठे 20,000 निहत्थे लोगों पर — बिना चेतावनी दिए और बाहर निकलने का रास्ता बंद करके — गोलियाँ चलाने का आदेश दिया। आधिकारिक आँकड़ा: 379 मृत, 1,200 घायल। इस नरसंहार ने भारत के शिक्षित वर्ग के बीच ब्रिटिश न्याय में विश्वास स्थायी रूप से समाप्त कर दिया। रवींद्रनाथ टैगोर ने विरोध में अपनी नाइटहुड वापस लौटा दी। गाँधी, जो पहले असमंजस में थे, अब पूरी तरह असहयोग के मार्ग पर आ गए — जिसने 1920 के असहयोग आंदोलन को अपरिहार्य बना दिया।
