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संभावित प्रश्न एवं उत्तर
आदर्श उत्तर:
व्यपगत सिद्धांत (लॉर्ड डलहौज़ी, 1848–1856) ने भारतीय शासकों से दत्तक पुत्र लेने का अधिकार छीन लिया — प्राकृतिक पुरुष उत्तराधिकारी न होने पर राज्य स्वतः ब्रिटिश संप्रभुता में "लैप्स" हो जाता था। इसके अंतर्गत अधिग्रहीत राज्य: सतारा (1848), झाँसी (1853), नागपुर (1854) और संभलपुर (1849)। अवध (1856, "कुशासन" के आधार पर) के विलय ने उस आक्रोश को और भड़काया, जिसने 1857 के विद्रोह को जन्म दिया।
आदर्श उत्तर:
दादाभाई नौरोजी ने Poverty and Un-British Rule in India (1901) में तर्क दिया कि ब्रिटेन "Home Charges" — ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन, रेलवे ऋण पर ब्याज, India Office की लागत, और प्रेषित लाभ — के माध्यम से प्रतिवर्ष £1.2–3 करोड़ भारत से निकाल लेता था। यह एकतरफ़ा हस्तांतरण भारत को संरचनात्मक रूप से निर्धन बना रहा था। R.C. दत्त (Economic History of India, 1902) ने भूमि राजस्व नीति की बार-बार पड़ने वाले अकालों में भूमिका बताकर इस सिद्धांत को और पुष्ट किया।
आदर्श उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त (कॉर्नवालिस, 1793, बंगाल): ज़मींदारों के साथ भूमि राजस्व सदा के लिए तय; किसान काश्तकार बन गए; ब्रिटिश-समर्थक ज़मींदार वर्ग का निर्माण हुआ। रैयतवाड़ी (मुनरो, 1820, मद्रास/बंबई): राजस्व सीधे व्यक्तिगत काश्तकारों से तय; ऊँची दरों ने ग्रामीण ऋणग्रस्तता बढ़ाई। महालवाड़ी (बेंटिंक, उत्तर-पश्चिमी प्रांत): राजस्व सामूहिक रूप से गाँवों के साथ तय; संयुक्त देनदारी। तीनों व्यवस्थाओं ने कृषि अधिशेष को व्यवस्थित रूप से निकाला, अंतर केवल मध्यस्थ के स्तर का था।
आदर्श उत्तर:
सहायक संधि (लॉर्ड वेलेज़ली, 1798) भारत में ब्रिटिश राजनीतिक विस्तार का सबसे प्रभावी साधन थी — इसने भारतीय शासकों के संसाधनों से उनकी अधीनता का वित्तपोषण करते हुए प्रत्यक्ष विलय के बिना क्षेत्रीय वर्चस्व स्थापित किया।
कार्यप्रणाली: भारतीय शासक अपने खर्च पर ब्रिटिश सेना रखते थे, दरबार में ब्रिटिश रेज़ीडेंट स्वीकार करते थे, और स्वतंत्र विदेश नीति का अधिकार छोड़ते थे। बदले में ब्रिटेन बाहरी खतरों से सुरक्षा की गारंटी देता था। ये शर्तें भले ही सौम्य लगती थीं, किंतु इनके परिणाम विनाशकारी थे।
प्रभाव: पहला, ब्रिटिश सहायक सेना का खर्च राज्य के कोष को लगातार चाट जाता था — अवध के राजस्व का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश गैरीसन की सेवा में जाता था। दूसरा, ब्रिटिश रेज़ीडेंट वास्तविक शासक बन जाता था — नाममात्र के शासक को नज़रअंदाज़ करके। तीसरा, गैर-ब्रिटिश यूरोपीय अधिकारियों पर प्रतिबंध ने शासकों को फ्रांसीसी या डच सैन्य सलाहकार रखने से रोका, जिससे ब्रिटिश शक्ति के विरुद्ध संतुलन की संभावना समाप्त हो गई।
मूल्यांकन: 1818 तक लगभग सभी प्रमुख भारतीय शक्तियाँ — हैदराबाद, अवध, मराठा संघ — सहायक संधि के अधीन आ चुकी थीं। यह साझेदारी नहीं, बल्कि विलय की सीढ़ी थी। जो राज्य "अत्यधिक निर्भर" हो गए (जैसे अवध, 1856) उन्हें "कुशासन" के बहाने अधिग्रहीत कर लिया गया। यह रणनीति 20वीं सदी के "प्रभाव-क्षेत्र" की अग्रदूत थी।
आदर्श उत्तर:
ब्रिटिश प्रशासनिक एकीकरण एक विरोधाभास लेकर आया: संसाधन-निष्कर्षण के लिए बनाई गई औपनिवेशिक व्यवस्था ने अनजाने में ऐसी संस्थागत आधारभूत संरचना तैयार की, जिसे स्वतंत्र भारत ने विरासत में लेकर अपनाया।
सिविल सेवा: ICS (Charter Act 1833, प्रतियोगी परीक्षाएँ 1853) ने एक योग्यता-आधारित — भले ही नस्लीय रूप से सीमित — नौकरशाही बनाई। 1919 के बाद भारतीय ICS में प्रवेश पाने लगे; 1947 तक वे सेवा का 50% थे। भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) ने न्यूनतम संरचनात्मक बदलाव के साथ ICS की सीधी उत्तराधिकारी बनी।
न्यायिक संहिताबद्धता: मैकॉले की Indian Penal Code (1860), Code of Criminal Procedure (1861), और Civil Procedure Code ने उपमहाद्वीप में एकसमान कानूनी व्यवस्था बनाई — सैकड़ों व्यक्तिगत कानूनों और स्थानीय रीति-रिवाजों की जगह ली। ये संहिताएँ (संशोधनों सहित) आज भी भारतीय आपराधिक और दीवानी कानून का आधार हैं।
विधायी ढाँचा: विधायी परिषदों का क्रमिक विस्तार (1861–1919) प्रतिनिधि सरकार का एक खाका तैयार करता गया — भले ही प्रतिनिधित्व सीमित था। Government of India Act 1935 भारत के 1950 के संविधान का आधार बना — संघीय ढाँचा, शक्तियों का विभाजन (केंद्र/राज्य/समवर्ती सूचियाँ) और कई प्रक्रियागत प्रावधान सीधे उसमें से लिए गए।
विरोधाभास: भारत का प्रशासनिक एकीकरण — एकल मुद्रा, कानून, प्रशासनिक भाषा, रेलवे नेटवर्क, टेलीग्राफ व्यवस्था — ने एक एकजुट राष्ट्रीय पहचान की जड़ें तैयार कीं, जो ब्रिटिश शासन को चुनौती दे सके। अंग्रेज़ों ने वह "पिंजरा" खुद बनाया, जिससे स्वतंत्रता आंदोलन ने अपनी मुक्ति की राह निकाली।
आदर्श उत्तर:
लॉर्ड मैकॉले के 1835 के "शिक्षा संबंधी विवरण" ने ब्रिटिश-वित्तपोषित भारतीय विद्यालयों में संस्कृत, अरबी और फ़ारसी की जगह अंग्रेज़ी को शिक्षा का माध्यम बनाया। मैकॉले का लक्ष्य था "खून से भारतीय, किंतु रुचि और बुद्धि से अंग्रेज़" एक वर्ग तैयार करना। इस नीति ने एक ओर वफ़ादार औपनिवेशिक नौकरशाही तैयार की, और दूसरी ओर — अनजाने में — ऐसे अंग्रेज़ी-शिक्षित राष्ट्रवादी नेता (नौरोजी, गोखले, तिलक) पैदा किए, जिन्होंने पश्चिमी स्वतंत्रता के विचारों का उपयोग स्वतंत्रता की माँग के लिए किया।
