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राजनीतिक एकीकरण — तरीके एवं साधन
2.1 व्यापार से क्षेत्रीय नियंत्रण तक
ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) को 1600 में व्यापार के लिए पहला चार्टर मिला; यह एक श्रृंखलाबद्ध युद्धों के माध्यम से क्षेत्रीय शक्ति में बदल गई:
- प्लासी का युद्ध (1757): रॉबर्ट क्लाइव की नवाब सिराज-उद-दौला पर विजय — EIC बंगाल में राजनीतिक शक्ति बन गई।
- बक्सर का युद्ध (1764): नवाब मीर कासिम, अवध के नवाब और मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेनाओं पर निर्णायक विजय — उत्तर भारत पर ब्रिटिश सर्वोच्चता स्थापित हुई।
- इलाहाबाद की संधि (1765): शाह आलम द्वितीय ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा का दीवानी (राजस्व संग्रह अधिकार) EIC को प्रदान किया — भारत में ब्रिटिश आर्थिक शक्ति की नींव।
2.2 सहायक संधि (1798–1818)
लॉर्ड वेलेज़ली की सहायक संधि ने भारतीय शासकों को अधीनस्थ ग्राहकों में बदल दिया।
संधि की शर्तें
भारतीय शासकों को आवश्यक था कि वे:
- अपने क्षेत्र में अपने खर्च पर ब्रिटिश सेना की एक टुकड़ी रखें
- अपने दरबार में ब्रिटिश रेज़ीडेंट स्वीकार करें
- ब्रिटिश सहमति के बिना कोई विदेश संधि न करें
- प्रतिद्वंद्वी राष्ट्रों के यूरोपीय लोगों को नियुक्त न करें
बदले में ब्रिटेन ने बाहरी शत्रुओं और आंतरिक विद्रोह से सुरक्षा की गारंटी दी।
सहायक संधि के अंतर्गत राज्य (कालक्रम)
| राज्य | वर्ष | गवर्नर-जनरल |
|---|---|---|
| हैदराबाद | 1798 | वेलेज़ली |
| मैसूर | 1799 | वेलेज़ली (टीपू सुल्तान को हराने के बाद) |
| तंजौर, सूरत | 1799 | वेलेज़ली |
| अवध | 1801 | वेलेज़ली |
| पेशवा बाजी राव द्वितीय (बेसिन की संधि) | 1802 | वेलेज़ली |
| मराठा सरदार (सिंधिया, भोंसले, होल्कर) | 1803–18 | वेलेज़ली → हेस्टिंग्स |
प्रभाव
- भारतीय शासकों की स्वतंत्रता वास्तव में समाप्त हो गई
- ब्रिटिश सेना रखने के खर्च ने राज्यों की वित्त-व्यवस्था बर्बाद कर दी
- ब्रिटिश रेज़ीडेंट सिंहासन के पीछे की असली शक्ति बन गया
- सहायक सेनाएँ ब्रिटिश भारतीय सेना की भर्ती का आधार बनीं
2.3 व्यपगत सिद्धांत (1848–1856)
लॉर्ड डलहौजी के व्यपगत सिद्धांत ने गोद लिए पुत्र को सामंती राज्य विरासत में पाने का अधिकार नकार दिया — केवल प्राकृतिक पुरुष उत्तराधिकारी को इस प्रयोजन के लिए मान्यता दी जा सकती थी।
व्यपगत सिद्धांत के अंतर्गत अधिग्रहीत राज्य
- सतारा (1848) — पहला प्रयोग
- जैतपुर और संबलपुर (1849)
- बाघत (1850)
- उदयपुर (1852)
- झाँसी (1853) — रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव के बावजूद
- नागपुर (1854)
अवध का अधिग्रहण (1856): अवध को कथित "कुशासन" के अलग आधार पर अधिग्रहीत किया गया — जो दर्शाता था कि वैध उत्तराधिकारी वाले राज्य भी सुरक्षित नहीं थे।
1857 पर प्रभाव
व्यपगत सिद्धांत ने शासक वर्ग की अपनी स्थिति की सुरक्षा छीन ली। अवध के अधिग्रहण ने वहाँ के नवाब, सेना के अधिकारियों और नागरिक जनता को क्रोधित किया। वंचित शासक 1857 के विद्रोह के मुख्य नेता बने: रानी लक्ष्मीबाई (झाँसी), नाना साहब (पेशवा के दत्तक पुत्र), और बेगम हज़रत महल (अवध)।
2.4 अन्य प्रमुख राजनीतिक साधन
रिंग फेंस नीति (वॉरेन हेस्टिंग्स): ब्रिटेन भारतीय राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन ब्रिटिश भारत के आसपास बफर राज्यों की एक पट्टी बनाए रखेगा।
परमोच्चता की नीति (1818 के बाद): ब्रिटेन ने स्वयं को भारत की सर्वोच्च शक्ति घोषित किया — सभी भारतीय शासक परमोच्च शक्ति के अधीनस्थ हो गए; भारतीय राजसी विवादों में ब्रिटिश मध्यस्थता।
धर्म में अहस्तक्षेप की नीति (1858 की घोषणा): 1857 के बाद, अंग्रेज़ों ने रूढ़िवादी भारतीय जनमत को नाराज़ न करने के लिए सामाजिक "सुधार" नीतियों (विधवा पुनर्विवाह, सती-उन्मूलन लागूकरण, राज्य से ईसाई मिशनरी समर्थन) को वापस लिया।
