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शिक्षा नीति और उसकी दोहरी विरासत
5.1 प्राच्यवादी-आंग्लवादी विवाद
ब्रिटिश भारतीयों को कैसे शिक्षित करें, इस पर विभाजित थे, जिससे एक मूलभूत बहस उत्पन्न हुई:
- प्राच्यवादी (एच.एच. विल्सन के नेतृत्व में): राज्य-वित्तपोषित महाविद्यालयों में पारंपरिक भारतीय शिक्षा — संस्कृत, अरबी, फ़ारसी — का समर्थन। तर्क: भारतीय परंपरा का सम्मान और शासन के लिए व्यावहारिक उपयोगिता।
- आंग्लवादी (मैकॉले, बेंटिक के नेतृत्व में): प्राच्य शिक्षा को अंग्रेज़ी-माध्यम पश्चिमी वैज्ञानिक शिक्षा से प्रतिस्थापित करो। तर्क: अंग्रेज़ी वैश्विक विज्ञान और वाणिज्य की भाषा है; "देशी साहित्य" हीन है।
मैकॉले का विवरण-पत्र (1835) ने बहस को आंग्लवाद के पक्ष में निपटाया — विलियम बेंटिक के 1835 के शिक्षा-संबंधी प्रस्ताव ने अंग्रेज़ी को शिक्षा का माध्यम अपनाया।
"ऊपर से नीचे निस्यंदन" सिद्धांत
शिक्षा शिक्षित अभिजात वर्ग से जनसामान्य में "निस्यंदित" होगी — लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। अंग्रेज़ी-माध्यम शिक्षा ने अंग्रेज़ीकृत भारतीयों की एक पतली परत बनाई जो ब्रिटेन के लिए शासन करती थी, लेकिन जनसामान्य को शिक्षित नहीं करती थी। भारतीय भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा पूरे औपनिवेशिक काल में उपेक्षित रही।
5.2 अनपेक्षित परिणाम
अंग्रेज़ी-शिक्षित भारतीय अभिजात वर्ग ने अपनी पश्चिमी शिक्षा — स्वतंत्रता, लोकतंत्र, राष्ट्रवाद और आत्मनिर्णय के विचारों सहित — को स्वयं ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उपयोग किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की संस्थापक पीढ़ी (दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक, सुरेंद्रनाथ बनर्जी) सभी अंग्रेज़ी शिक्षा की उपज थे जिन्होंने भारतीय स्वशासन की माँग के लिए पश्चिमी अवधारणाओं का उपयोग किया।
