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इतिहास

संभावित प्रश्न एवं उत्तर

धार्मिक आंदोलन एवं दर्शन (प्राचीन एवं मध्यकालीन)

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 9 / 11 0 PYQ 31 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

संभावित प्रश्न एवं उत्तर


प्र.1 (5 अंक — 50 शब्द): भारतीय दर्शन के छह आस्तिक दर्शनों (आस्तिक दर्शन) के नाम बताइए और उनकी संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।

आदर्श उत्तर:
छह आस्तिक दर्शन वैदिक प्रामाणिकता स्वीकार करते हैं: न्याय (गौतम) — तर्क और 4 प्रमाण; वैशेषिक (कणाद) — परमाणुवाद; सांख्य (कपिल) — पुरुष-प्रकृति द्वैत; योग (पतंजलि) — अष्टांग साधना मार्ग; मीमांसा (जैमिनि) — वैदिक कर्मकांड; वेदांत (बादरायण) — ब्रह्म-आत्मा संबंध। तीन नास्तिक दर्शन (बौद्ध, जैन, चार्वाक) वैदिक सत्ता को अस्वीकार करते हैं।


प्र.2 (5 अंक — 50 शब्द): भारत में चिश्ती सूफी सिलसिले पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

आदर्श उत्तर:
चिश्ती सिलसिले की स्थापना भारत में मोइनुद्दीन चिश्ती (लगभग 1141–1236 ई.) ने अजमेर में की, जिन्हें "ग़रीब नवाज़" कहा जाता है। प्रमुख उत्तराधिकारी: क़ुतुबुद्दीन बख्तियार काकी (दिल्ली) और निज़ामुद्दीन औलिया (दिल्ली, 1325 ई.)। यह सिलसिला प्रेम, ग़रीबों की सेवा और भक्ति संगीत (समा/क़व्वाली) पर ज़ोर देने के लिए जाना जाता था। हिंदू आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति सबसे अधिक खुलेपन और सभी समुदायों में विस्तृत सामाजिक आधार के कारण यह सबसे प्रभावशाली सूफ़ी सिलसिला बना।


प्र.3 (5 अंक — 50 शब्द): जैन दर्शन में अनेकांतवाद और स्याद्वाद की व्याख्या कीजिए।

आदर्श उत्तर:
अनेकांतवाद ("अनेक पक्षता") की मान्यता है कि वास्तविकता जटिल है और कोई भी एकल दृष्टिकोण उसे पूरी तरह नहीं पकड़ सकता — प्रत्येक कथन में आंशिक सत्यता होती है। स्याद्वाद (सापेक्ष कथन) में हर कथन को "किसी अर्थ में" (स्यात्) से संशोधित करना होता है — जिससे सात प्रकार के कथन बनते हैं: "है", "नहीं है", "है भी और नहीं भी है" आदि। दोनों मिलकर एक परिष्कृत सापेक्षवादी ज्ञानमीमांसा बनाते हैं, जो किसी भी एकल विचारधारा के हठधर्मी सत्य-दावों को चुनौती देती है।


प्र.4 (10 अंक — 150 शब्द): मध्यकालीन भारत में भक्ति आंदोलन के सामाजिक महत्त्व का मूल्यांकन कीजिए। इसने विद्यमान सामाजिक पदानुक्रमों को किस प्रकार चुनौती दी?

आदर्श उत्तर:
भक्ति आंदोलन (6वीं–17वीं शती) केवल धार्मिक पुनरुत्थान नहीं था, बल्कि मध्यकालीन भारत की जाति-आधारित, कर्मकांड-प्रधान सामाजिक व्यवस्था को एक गहरी चुनौती देने वाला सामाजिक क्रांति था।

जाति को चुनौती: भक्ति संतों ने जाति की सीमाओं से परे शिष्य स्वीकार किए — रामानंद के बारह शिष्यों में कबीर (मुस्लिम जुलाहा), रैदास (चमार), और सेना (नाई) शामिल थे। तुकाराम, एक शूद्र, ब्राह्मणों के उत्पीड़न के बावजूद सत्य-सिद्ध हुए। नयनमारों में तिरुनीलकंठ नयनार और कन्नप्पर जैसे "अस्पृश्य" संत भी थे।

महिला सशक्तीकरण: मीराबाई (राजपूतानी), अंडाल (तमिल अलवार) और अक्का महादेवी (कर्नाटक, लिंगायत) जैसी महिला संतों ने गृहस्थी की भूमिका से स्वतंत्र आध्यात्मिक अधिकार का दावा किया — मध्यकालीन पितृसत्तात्मक समाज में यह साहसिक कदम था।

भाषा का लोकतंत्रीकरण: तमिल, मराठी, अवधी, ब्रजभाषा और राजस्थानी में रचना करके भक्ति संतों ने धार्मिक अभिव्यक्ति को जन-सामान्य तक पहुँचाया, जिससे आध्यात्मिक ज्ञान संस्कृत की सीमा से मुक्त हुआ।

सीमाएँ: कर्मकांड को चुनौती देने के बावजूद अधिकांश भक्ति संतों ने जाति व्यवस्था को सामाजिक संस्था के रूप में सीधे नकारा नहीं। जाति काफ़ी हद तक बनी रही। इस आंदोलन का सामाजिक प्रभाव संरचनात्मक से अधिक सांस्कृतिक था — इसने धर्म के भीतर हाशिये की आवाज़ों को जगह दी, पर सामाजिक ढाँचा नहीं तोड़ा।


प्र.5 (10 अंक — 150 शब्द): वेदांत के अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत विद्यालयों के मूल दर्शन की तुलना कीजिए। प्रत्येक की स्थापना किस संत ने की?

आदर्श उत्तर:
तीनों वेदांत विचारधाराएँ उपनिषद, ब्रह्म सूत्र और भगवद्गीता (प्रस्थानत्रयी) की व्याख्या करती हैं, पर ईश्वर, आत्मा और जगत के संबंध पर अलग-अलग निष्कर्ष पर पहुँचती हैं।

अद्वैत वेदांत (शंकराचार्य, लगभग 788–820 ई.): "अद्वैत" — एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है; व्यक्तिगत आत्मा अंततः ब्रह्म से अभिन्न है; दृश्य जगत माया है (ब्रह्म पर आरोपित भ्रम)। मोक्ष = इस अभेद का साक्षात्कार। शंकराचार्य ने इस शिक्षा के प्रसार के लिए चार मठ (श्रृंगेरी, पुरी, द्वारका, बदरीनाथ) स्थापित किए।

विशिष्टाद्वैत (रामानुज, लगभग 1017–1137 ई.): "विशिष्ट अद्वैत" — ब्रह्म सत्य है और व्यक्तिगत आत्माओं (चित्) व जगत (अचित्) का अंतर्यामी नियंता है, जो उसके "शरीर" के रूप में सत्य हैं। व्यक्तिगत ईश्वर (विष्णु/नारायण) की भक्ति मोक्ष की ओर ले जाती है। इस विचारधारा ने अलवार भक्ति परंपरा और उत्तर भारतीय वैष्णवता को प्रभावित किया।

द्वैत (मध्व, लगभग 1238–1317 ई.): "शुद्ध द्वैत" — ईश्वर (विष्णु), व्यक्तिगत आत्माएँ (जीव) और भौतिक जगत तीन सदा-भिन्न वास्तविकताएँ हैं। कोई भी आत्मा कभी ईश्वर से अभिन्न नहीं होती। मोक्ष = ईश्वर की उपस्थिति का शाश्वत सचेत आनंद, न कि ब्रह्म में विलय। इस विचारधारा ने कर्नाटक में हरिदास भक्ति संगीत परंपरा को प्रेरित किया।

तीनों विचारधाराएँ कट्टर अद्वैतवाद (अद्वैत) से लेकर मध्यम विशिष्ट एकवाद (विशिष्टाद्वैत) और सख्त द्वैतवाद (द्वैत) तक का क्रम प्रस्तुत करती हैं — और आधुनिक भारत में भी ये तीनों जीवंत दार्शनिक परंपराएँ हैं।


प्र.6 (5 अंक — 50 शब्द): नयनमार और अलवार कौन थे? भारतीय भक्ति साहित्य में उनका क्या योगदान है?

आदर्श उत्तर:
नयनमार 63 तमिल शैव संत थे (6वीं–9वीं शती), जिनके भजन तेवारम (तिरुमुरई की प्रथम 7 पुस्तकें) में संकलित हैं। अलवार 12 तमिल वैष्णव संत थे, जिनके 4,000 पद नालायिर दिव्य प्रबंधम ("तमिल वेद") का रूप हैं। दोनों ने स्थानीय तमिल भाषा में भक्ति भावना को अग्रणी रूप से प्रस्तुत किया, धार्मिक अभिव्यक्ति को जनसाधारण तक पहुँचाया, उत्तर भारत के परवर्ती भक्ति आंदोलनों को प्रेरित किया, और तमिलनाडु की सबसे प्रिय भक्ति साहित्य विरासत का सृजन किया।