सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन
भक्ति आंदोलन — संत एवं दर्शन
5.1 उद्गम और तमिल भक्ति (6वीं–9वीं शती)
भक्ति आंदोलन एक गहन आध्यात्मिक एवं सामाजिक क्रांति का प्रतिनिधित्व करता है — ईश्वर के प्रति प्रत्यक्ष, वैयक्तिक भक्ति, जो कर्मकांड, जाति और पुरोहित मध्यस्थों को पार करती थी।
अलवार (वैष्णव भक्ति)
12 तमिल संतों (6वीं–9वीं शती ई.) ने 4,000 तमिल पद रचे जो सामूहिक रूप से नालायिर दिव्य प्रबंधम ("4,000 पवित्र रचनाएँ") के नाम से जाने जाते हैं। इस संग्रह को नाथमुनि (लगभग 824–924 ई.) ने संकलित किया, जिन्होंने खोई हुई कृतियों को पुनः खोजा और उन्हें "तमिल वेद" के रूप में प्रचारित किया। प्रमुख अलवार संत:
- नम्मालवार — तिरुवायमोलि (1,102 पद) के रचयिता, जिन्हें व्यक्तिगत रूप से "तमिल वेद" कहा जाता है
- अंडाल — एकमात्र महिला अलवार; तिरुप्पावई की रचयिता
- पेरियालवार और कुलशेखर अलवार
नयनमार (शैव भक्ति)
63 तमिल संतों के भजन तिरुमुरई (12 पुस्तकें) में संकलित हैं। प्रथम सात पुस्तकें — सामूहिक रूप से तेवारम — में भजन हैं:
- अप्पार (तिरुनावुक्करसर)
- सुंदरमूर्ति (सुंदरर)
- तिरुग्नान सम्बंदर
तिरुवाचकम मणिक्कवाचकर (9वीं शती) द्वारा एक परवर्ती जोड़ (8वीं पुस्तक) है।
5.2 महाराष्ट्र भक्ति — वारकरी संप्रदाय
वारकरी आंदोलन पंढरपुर (महाराष्ट्र) में विठोबा (विट्ठल/विष्णु) की उपासना के लिए तीर्थयात्रा पर केंद्रित था। प्रमुख संत:
- ज्ञानेश्वर (1275–1296 ई.): ज्ञानेश्वरी (1290 ई.) की रचना — 9,000 पदों में भगवद्गीता पर मराठी टीका — 15/16 वर्ष की आयु में; अमृतानुभव भी रचा
- नामदेव (लगभग 1270–1350 ई.): दर्जी-संत; उनके अभंग मराठी संग्रहों और सिख आदि ग्रंथ दोनों में मिलते हैं
- एकनाथ (1533–1599 ई.): विद्वान-संत जिन्होंने संस्कृत ग्रंथों का मराठी में अनुवाद एवं टीका की
- तुकाराम (1608–1650 ई.): सर्वश्रेष्ठ वारकरी कवि; उनके अभंग सामाजिक पदानुक्रम को ललकारते हैं और ईश्वर के समक्ष समानता पर बल देते हैं; ब्राह्मणों द्वारा उत्पीड़ित पर अंततः सत्य-सिद्ध
5.3 उत्तर भारतीय भक्ति (14वीं–17वीं शती)
रामानंद
रामानंद (लगभग 1360–1450 ई.), रामानुज के विशिष्टाद्वैत विद्यालय के शिष्य, उत्तर भारत और दक्षिण भारतीय भक्ति धाराओं के बीच सेतु बने। उन्होंने संस्कृत के बजाय हिंदी में उपदेश दिया और जाति निरपेक्ष शिष्य स्वीकार किए। उनके 12 शिष्यों में कबीर (मुस्लिम जुलाहा), रैदास (चमार), और सेना (नाई) शामिल थे।
कबीर (लगभग 1440–1518 ई.)
कबीर ने निर्गुण भक्ति — निराकार, अनाम ईश्वर (राम, हरि, अल्लाह — सभी एक) की भक्ति — का प्रचार किया। उनकी मूल शिक्षाएँ:
- ईश्वर प्रत्येक मानव हृदय में है; जाति आध्यात्मिक दृष्टि से अर्थहीन है
- हिंदू धर्म और इस्लाम दोनों के कर्मकांड सच्ची भक्ति में बाधा हैं
- दोहे और पद तीन मुख्य संग्रहों में: बीजक (कबीर पंथी), आदि ग्रंथ (सिख), ग्रंथावली (दादू पंथी)
मीराबाई (लगभग 1498–1547 ई.)
मीराबाई, मेड़ता (राजस्थान) की राजपूत राजकुमारी-संत, चित्तौड़ के राजपरिवार में विवाहित होकर भी कृष्ण को अपना "दिव्य पति" मानकर गृहस्थी त्याग दी। उन्होंने राजस्थानी और ब्रजभाषा में सैकड़ों भजन रचे — सर्वाधिक प्रसिद्ध "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।" वे भक्ति आंदोलन की नारी आवाज़ और पितृसत्ता-विरोधी आध्यात्मिकता की प्रतीक हैं।
सूरदास (लगभग 1478–1583 ई.)
सूरदास, ब्रज (आगरा क्षेत्र) के अंध वैष्णव संत, ने ब्रजभाषा में लगभग 1,25,000 पद रचे जो सूर सागर में संकलित हैं — मुख्यतः कृष्ण की बाल लीला और यौवन को समर्पित। वे "अष्टछाप" — वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय के आठ कवि-संतों — में से एक हैं।
तुलसीदास (1532–1623 ई.)
तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस (1574–1577) की रचना की — उत्तर भारत की निश्चायक लोक-भाषा रामायण, 7 काण्डों में 10,902 पंक्तियाँ। उन्होंने विनयपत्रिका, कवितावली और अन्य ग्रंथ भी रचे। रामचरितमानस प्रतिदिन लाखों हिंदू घरों में पढ़ी जाती है — उत्तर भारतीय जन-संस्कृति का संभवतः सर्वाधिक प्रभावशाली एकल ग्रंथ।
चैतन्य महाप्रभु (1486–1534 ई.)
चैतन्य महाप्रभु, बंगाली वैष्णव संत, ने गौड़ीय वैष्णववाद परंपरा की नींव रखी। उन्होंने कीर्तन (भक्ति गायन) और प्रेम भक्ति (कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम) पर बल दिया। उनके अनुयायियों ने छः वृंदावन गोस्वामी परंपरा स्थापित की; ISKCON इसी परंपरा से अपनी वंशावली जोड़ता है।
5.4 सिख धर्म (15वीं–17वीं शती)
गुरु नानक (1469–1539 ई.)
गुरु नानक, ननकाना साहिब (अब पाकिस्तान) में जन्मे, ने चार मूल सिद्धांत प्रचारित किए:
- एक ओंकार — एक ईश्वर
- किरत करो — ईमानदार कार्य
- वंड छको — दूसरों के साथ बाँटो
- नाम जपो — ईश्वर के नाम का ध्यान
उन्होंने भारत और मक्का-बगदाद तक चार विस्तृत यात्राएँ (उदासियाँ) कीं। उनकी रचनाएँ आदि ग्रंथ (परवर्ती गुरु ग्रंथ साहिब) का मूल बनाती हैं।
गुरु ग्रंथ साहिब (1604 में संकलित)
सिख धर्मग्रंथ पाँचवें गुरु अर्जन देव द्वारा संकलित हुआ। इसमें छः सिख गुरुओं के भजनों के साथ कबीर, नामदेव, रैदास, फरीद आदि 15 संतों की रचनाएँ शामिल हैं — एक अनूठा समावेशी धर्मग्रंथ। दसवें और अंतिम गुरु गोबिंद सिंह (1666–1708) ने इसे शाश्वत गुरु घोषित किया।
