Skip to main content

इतिहास

मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य एवं प्रदर्शन कला

भारतीय विरासत: ललित कला, प्रदर्शन कला, स्थापत्य, साहित्य (सिंधु सभ्यता से ब्रिटिश काल तक)

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 5 / 11 0 PYQ 32 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य एवं प्रदर्शन कला

4.1 क्षेत्रीय मंदिर स्थापत्य (600–1300 ई.)

गुप्तोत्तर क्षेत्रीय राज्यों ने प्रत्येक ने विशिष्ट स्थापत्य परंपराएँ विकसित कीं।

चालुक्य स्थापत्य (6वीं–8वीं शती, दक्कन)

बादामी और वातापी के चालुक्यों ने ऐहोल, बादामी और पत्तदकल में शैल-कट तथा संरचनात्मक दोनों प्रकार के मंदिर बनाए।

  • ऐहोल — "मंदिर स्थापत्य की उद्गम-भूमि" — 125 से अधिक मंदिर
  • पत्तदकल — UNESCO विश्व धरोहर स्थल
  • पत्तदकल का विरुपाक्ष मंदिर (लगभग 740 ई.) — विस्तृत मूर्तिकला कार्यक्रम के साथ प्रारंभिक द्रविड़ उत्कृष्टकृति

पल्लव स्थापत्य (7वीं–9वीं शती, तमिलनाडु)

  • महाबलिपुरम का शोर मंदिर (लगभग 700–728 ई., UNESCO विरासत) — दक्षिण भारत का प्रारंभिकतम मुक्त-खड़ा पत्थर मंदिर
  • गंगावतरण (महाबलिपुरम) — विश्व की सबसे बड़ी बेसरिलीफ नक्काशियों में से एक (27 मी. × 9 मी.)

चोल स्थापत्य (9वीं–13वीं शती, तमिलनाडु)

  • बृहदेश्वर (राजराजेश्वर) मंदिर, तंजावुर (1010 ई., राजराज I): 66 मीटर ऊँचा विमान — उस समय भारत में सबसे ऊँचा; प्रथम "साम्राज्यिक चोल" पैमाने का
  • गंगैकोंडचोलपुरम मंदिर (1035 ई., राजेंद्र I) — तंजावुर मॉडल का अनुसरण

चंदेल स्थापत्य (9वीं–11वीं शती, मध्य प्रदेश)

  • खजुराहो मंदिर (950–1050 ई. में निर्मित, UNESCO विरासत 1986) — नागर स्थापत्य का शिखर
  • कंदारिया महादेव मंदिर (लगभग 1025 ई.): 31 मीटर शिखर, 872 कामुक मूर्तियाँ — पवित्र ज्यामिति और तांत्रिक परंपरा का संश्लेषण

4.2 दिल्ली सल्तनत स्थापत्य (1206–1526 ई.)

दिल्ली सल्तनत ने भारतीय स्थापत्य में वास्तविक मेहराब और गुंबद प्रस्तुत किए, जिन्होंने पूर्ववर्ती कोर्बेल मेहराब का स्थान लिया। प्रमुख योगदान:

  • कुतुब मीनार (दिल्ली, 1193–1220 ई.): 72.5 मीटर ऊँची बलुआ पत्थर की मीनार — भारत की सबसे ऊँची मीनार; कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा निर्मित, इल्तुतमिश द्वारा पूर्ण
  • अलाई दरवाज़ा (1311, अलाउद्दीन खिलजी) — भारत में पूर्णतः इस्लामी चरित्र के वास्तविक मेहराब का प्रथम उपयोग
  • लोदी गार्डेन (दिल्ली): लोदी वंश (1451–1526) ने दोहरे गुंबद, अष्टभुजाकार मकबरे और सजावटी टाइलवर्क प्रस्तुत किए — मुगलों से पूर्व संक्रमणकालीन शैली
  • अदीना मस्जिद (पांडुआ, बंगाल, 1375, सिकंदर शाह): भारतीय उपमहाद्वीप में योजना क्षेत्रफल के अनुसार अब तक की सबसे बड़ी मस्जिद

4.3 मुगल स्थापत्य (1526–1707 ई.)

मुगल स्थापत्य फ़ारसी और भारतीय सौंदर्यशास्त्र का पूर्णतम संश्लेषण है।

बाबर से अकबर तक

  • बाबर (1526–1530): पानीपत, संभल और अयोध्या में मस्जिदें बनवाईं — कोई जीवित उत्कृष्टकृति नहीं
  • हुमायूँ का मकबरा, दिल्ली (1572, विधवा बेगा बेगम द्वारा निर्मित): भारत का प्रथम बाग-मकबरा (चारबाग योजना); ताजमहल का पूर्वगामी; UNESCO विरासत 1993
  • अकबर की फतेहपुर सीकरी (1571–1585): राजपूत और फ़ारसी तत्त्वों का संयोजन; बुलंद दरवाज़ा (1601) — 54 मीटर ऊँचा प्रवेश द्वार, भारत का सबसे ऊँचा

शाहजहाँ — मुगल स्थापत्य का शिखर

लाल बलुआ पत्थर से सफेद संगमरमर की ओर परिवर्तन:

  • ताजमहल, आगरा (1631–1653): मुमताज महल का मकबरा; 22 वर्ष, 20,000 कारीगर; चार मीनारें मुख्य गुंबद की रक्षा के लिए थोड़ी बाहर झुकी हैं; UNESCO विरासत 1983
  • लाल किला, दिल्ली (1638–1648): यमुना तट पर लाल बलुआ पत्थर का परिसर; मुगल सत्ता का केंद्र; UNESCO विरासत 2007
  • जामा मस्जिद, दिल्ली (1644–1656): भारत की सबसे बड़ी मस्जिद — तीन गुंबद, दो 40 मीटर मीनारें; आँगन में 25,000 नमाजी

औरंगजेब

बीबी का मकबरा (औरंगाबाद, लगभग 1660) — प्रायः "गरीबों का ताज" कहलाता है; औरंगजेब ने अपनी पत्नी के लिए बनवाया। औरंगजेब ने स्थापत्य भव्यता से दूरी बनाई।

4.4 शास्त्रीय और लोक प्रदर्शन कलाएँ

नाट्यशास्त्र — मूलभूत ग्रंथ

नाट्यशास्त्र (भरत मुनि को आरोपित, लगभग 200 ई.पू.–200 ई.), जिसमें 36 अध्यायों में 6,000 श्लोक हैं, समस्त भारतीय प्रदर्शन कलाओं का आधार ग्रंथ है। इसमें नव रस (नौ भावनात्मक सार) संहिताबद्ध हैं:

  • शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शांत

आठ शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ (संगीत नाटक अकादमी, स्थापना 1952)

  1. भरतनाट्यम (तमिलनाडु): मंदिर नृत्य की देवदासी परंपरा में जड़ें; 19वीं शती में तंजावुर चतुष्टय द्वारा संहिताबद्ध; ज्यामितीय मुद्राओं और अभिनय के लिए प्रसिद्ध।
  2. कथक (उत्तर भारत): कथाकारों (kathaka) से उत्पन्न; मुगल संरक्षण में फ़ारसी तत्त्वों (पदताल, चक्करें) के साथ विकसित; लखनऊ घराना (गेय) बनाम जयपुर घराना (ओजपूर्ण)।
  3. ओडिसी (ओडिशा): कोणार्क सूर्य मंदिर की मूर्तियों पर आधारित; त्रिभंग मुद्रा (सिर, धड़ और कूल्हों के तीन बिंदुओं पर मोड़) विशेषता।
  4. कुचिपुड़ी (आंध्र प्रदेश): कुचिपुड़ी गाँव के ब्राह्मण पुरुषों द्वारा नृत्य-नाटिका के रूप में उत्पन्न; ओजपूर्ण पदताल और अभिव्यक्तिपूर्ण कथा का संयोजन।
  5. कथकली (केरल): अत्यधिक शैलीबद्ध नृत्य-नाटक; विस्तृत श्रृंगार (छह मुख प्रकार: नायकों के लिए हरा/पच्चा); महाभारत/रामायण की कथाएँ।
  6. मणिपुरी (मणिपुर): वैष्णव परंपरा से जुड़ा; कोमल, गेय हलचलें; रास लीला मुख्य प्रदर्शन।
  7. मोहिनीअट्टम (केरल): "मोहिनी का नृत्य" — कोमल, लहरदार हलचलें; मोहिनी (विष्णु का स्त्री रूप) की कथाओं से जुड़ा।
  8. सत्त्रिया (असम): वैष्णव संत शंकरदेव (15वीं–16वीं शती) द्वारा संहिताबद्ध; सत्र मठों में प्रदर्शित।

शास्त्रीय संगीत — दो प्रणालियाँ

  • हिंदुस्तानी प्रणाली (उत्तर भारत): 13वीं शती के बाद फ़ारसी संगीत तत्त्व समाहित; राग और ताल के इर्द-गिर्द व्यवस्थित; अमीर खुसरो (1253–1325) को ख्याल शैली, तबला और सितार में नवाचारों का श्रेय; प्रमुख घराने: आगरा, ग्वालियर, जयपुर, किराना, पटियाला।
  • कर्नाटक प्रणाली (दक्षिण भारत): वैदिक स्वर से निकट संबंध; "कर्नाटक संगीत की त्रिमूर्ति" — त्यागराज (1767–1847), मुथुस्वामी दीक्षितर (1775–1835) और श्यामा शास्त्री (1762–1827) — सभी तमिलनाडु में एक ही पीढ़ी में जन्मे।