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वैदिक दर्शन एवं धार्मिक मत
छह आस्तिक दर्शन — RPSC PYQ 2021
भारतीय दर्शन के छह आस्तिक (— वैदिक प्रमाण को स्वीकार करने वाले) दर्शन-विद्यालयों को सम्मिलित रूप से षड्दर्शन कहते हैं। RPSC मेन्स 2021 में सीधे पूछा गया था कि "छह में से कोई चार के नाम लिखो।"
| दर्शन | प्रवर्तक | मूल सिद्धांत | प्रमुख ग्रंथ |
|---|---|---|---|
| न्याय | गौतम | तर्कशास्त्र; तर्क की 16 श्रेणियाँ; प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द के माध्यम से प्रमाण | न्याय सूत्र |
| वैशेषिक | कणाद | परमाणुवाद; ब्रह्मांड शाश्वत परमाणुओं (परमाणु) से बना; 6 पदार्थ | वैशेषिक सूत्र |
| सांख्य | कपिल | द्वैतवाद: पुरुष (चेतना) + प्रकृति (पदार्थ); 24 तत्त्व; मूल सांख्य में ईश्वर नहीं | सांख्य कारिका |
| योग | पतंजलि | मुक्ति के लिए अष्टांग योग; सांख्य तत्त्वमीमांसा + ईश्वर को स्वीकार करता है | योग सूत्र |
| मीमांसा | जैमिनि | वेदों की कर्मकांडात्मक व्याख्या; वैदिक विधान स्वयंप्रमाण | मीमांसा सूत्र |
| वेदांत | बादरायण (व्यास) | उपनिषद-समन्वय; तीन उप-संप्रदाय: अद्वैत (शंकर), विशिष्टाद्वैत (रामानुज), द्वैत (मध्व) | ब्रह्मसूत्र |
स्रोत: दासगुप्त, "हिस्ट्री ऑफ इंडियन फिलॉसफी"; RPSC 2026 पाठ्यक्रम
RPSC के लिए स्मरण-युक्ति (6 दर्शन): न्याय-वैशेषिक पूरक युगल; सांख्य-योग पूरक युगल; मीमांसा-वेदांत पूरक युगल।
नास्तिक (— वैदिक प्रमाण को अस्वीकार करने वाले) दर्शन: बौद्ध धर्म, जैन धर्म, चार्वाक (लोकायत) — तुलनात्मक प्रश्नों के लिए महत्त्वपूर्ण किंतु तकनीकी रूप से "आस्तिक" वर्गीकरण से बाहर।
प्रस्थान त्रयी — RPSC PYQ 2018
"प्रस्थान त्रयी" = वेदांत के तीन मूलभूत ग्रंथ:
- उपनिषद — कुल 108; 10-12 प्रमुख
- भगवद् गीता — महाभारत के 18 अध्याय; शंकर, रामानुज, मध्व ने सभी ने इस पर भाष्य लिखे
- ब्रह्मसूत्र — जिसे वेदांत सूत्र या उत्तर मीमांसा सूत्र भी कहते हैं; बादरायण के 555 सूत्र; उपनिषदीय विचार को क्रमबद्ध करता है
प्रत्येक प्रमुख वेदांत आचार्य — आदि शंकराचार्य (788–820 CE, अद्वैत), रामानुजाचार्य (1017–1137 CE, विशिष्टाद्वैत), मध्वाचार्य (1238–1317 CE, द्वैत) — ने तीनों ग्रंथों पर भाष्य (टीका) लिखे। तीन-ग्रंथीय प्रामाणिक स्थिति ही इन्हें "त्रयी" (त्रिक) बनाती है।
ऋण की अवधारणा — RPSC PYQ 2013
भारतीय परंपरा में ऋण (— कर्तव्य/दायित्व) की अवधारणा उन जन्मजात कर्तव्यों/दायित्वों को संदर्भित करती है जो प्रत्येक मनुष्य लेकर पैदा होता है। शास्त्रीय ग्रंथ (शतपथ ब्राह्मण, मनुस्मृति) तीन प्रमुख ऋणों का उल्लेख करते हैं:
- देव ऋण (— देवताओं के प्रति ऋण): यज्ञ (— अग्निहोत्र/अनुष्ठान) से मुक्त होते हैं
- ऋषि ऋण (— ऋषियों/आचार्यों के प्रति ऋण): स्वाध्याय (— शास्त्राध्ययन) और ज्ञान को अगली पीढ़ी को देने से मुक्त होते हैं
- पितृ ऋण (— पूर्वजों के प्रति ऋण): पिंड-दान और एक ऐसे पुत्र के माध्यम से मुक्त होते हैं जो श्राद्ध कर्म करे
कुछ ग्रंथ (मनुस्मृति 6.35) चौथा ऋण भी जोड़ते हैं: मनुष्य ऋण (— सहमानवों के प्रति ऋण), आतिथ्य और सामाजिक सेवा से मुक्त होते हैं।
ऋण की अवधारणा वैदिक धर्म सिद्धांत को सामाजिक दायित्व में निहित करती है — प्रत्येक व्यक्ति पारस्परिक ऋणों के एक जाल में विद्यमान है जो उनके कर्तव्यों को संरचित करता है।
नयनार और अलवार संत — RPSC PYQ 2023
नयनार (— तमिल शैव संत):
- शिव के 63 तमिल भक्त (लगभग 5वीं–9वीं शताब्दी CE)
- तेवारम की रचना — तमिल में भजनों के 7 खंड
- प्रमुख व्यक्तित्व: अप्पर (तिरुनावुक्करसर), संबंदर (तिरुज्ञान संबंदर), सुंदरर
- सामाजिक-धार्मिक महत्त्व: सभी जातियों के सदस्य शामिल — एक चर्मकार (तिरुनीलकंठ नयनार), अस्पृश्य, महिलाएँ — ब्राह्मणिक पदानुक्रम को चुनौती देते हुए; दैवीय स्तुति के लिए तमिल बोलचाल (संस्कृत नहीं) का प्रयोग
अलवार (— तमिल वैष्णव संत):
- विष्णु के 12 तमिल भक्त (लगभग 5वीं–10वीं शताब्दी CE)
- नालायिर दिव्य प्रबंधम (நாலாயிர திவ்ய பிரபந்தம் — 4,000 पद) तमिल में रचे
- प्रमुख व्यक्तित्व: नम्मालवार, अंडाल (एकमात्र महिला अलवार), पेरियालवार, कुलशेखर अलवार
- सामाजिक-धार्मिक महत्त्व: अंडाल (महिला संत), तिरुप्पान अलवार (पणर = अस्पृश्य समुदाय में जन्मे) — भक्ति आंदोलन की लैंगिक और जातीय बहिष्करण को चुनौती प्रदर्शित करते हुए; उनकी तमिल रचनाओं ने रामानुज द्वारा क्रमबद्ध श्री वैष्णव परंपरा का शास्त्रीय आधार बनाया
व्यापक महत्त्व: नयनार-अलवार आंदोलन (6वीं–10वीं शताब्दी CE) उत्तर भारतीय भक्ति संतों से 3–5 शताब्दी पहले हुए; उन्होंने लोकभाषा-आधारित, भावनात्मक रूप से गहन, जाति-समावेशी भक्ति का वह साँचा स्थापित किया जिसने बाद में कबीर, दादू दयाल और मीरा बाई को प्रभावित किया।
