Skip to main content

इतिहास

राजस्थान की संत परंपरा

धार्मिक आस्थाएँ, संत, लोक देवता

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 4 / 15 0 PYQ 53 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

राजस्थान की संत परंपरा

राजस्थान में भक्ति आंदोलन: सिंहावलोकन

राजस्थान मध्यकालीन भक्ति आंदोलन (लगभग 10वीं–17वीं शताब्दी CE) का प्रमुख केंद्र बना। राजस्थान की संत परंपरा दो धाराओं में विभाजित है, जो अखिल-भारतीय भक्ति वर्गीकरण के अनुरूप हैं:

धारा प्रकार प्रमुख व्यक्तित्व मूल विश्वास
सगुण भक्ति साकार ईश्वर (व्यक्तिगत देवता) मीरा बाई (कृष्ण), वल्लभाचार्य का प्रभाव ईश्वर के किसी साकार रूप के प्रति भक्ति
निर्गुण भक्ति निराकार ईश्वर (रूपहीन परम सत्य) दादू दयाल, रज्जब, सुंदरदास निराकार दिव्यता, मूर्ति-पूजा और जाति का अस्वीकार

स्रोत: RPSC 2026 पाठ्यक्रम, इकाई 1; मानक भक्ति-शोध

दादू दयाल और दादू पंथ

दादू दयाल राजस्थान में उद्भूत और मुख्यतः राजस्थान से संबद्ध सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निर्गुण भक्ति संत हैं।

जीवन-परिचय:

  • जन्म: 1544 CE, अहमदाबाद (गुजरात) — साबरमती नदी में एक शिशु के रूप में तैरते पाए गए; रूई धुनने वाले लोदी राम ने पाला-पोसा
  • राजस्थान आगमन: साँभर (जयपुर जिला), फिर आमेर, फिर नागौर जिले के नरैना में लगभग 1575 CE में
  • नरैना दादू पंथ का स्थायी मुख्यालय बना; नरैना में दादू द्वार मंदिर परिसर मुख्य पीठ है
  • निधन: 1603 CE, नरैना में

शिक्षाएँ:

  • परम निराकार ईश्वर (राम — अयोध्या के राम नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय राम = निराकार दिव्य)
  • जाति, अस्पृश्यता, मूर्ति-पूजा और खोखले कर्मकांड का अस्वीकार
  • कबीर से प्रभावित — दादू को पश्चिमी भारत में कबीर का प्राथमिक उत्तराधिकारी माना जाता है
  • सभी मार्गों की समानता; हिंदू और मुस्लिम दोनों भक्तों के प्रति सम्मान
  • दादू वाणी — उनकी संकलित रचनाएँ — में राजस्थानी/ब्रज भाषा में लगभग 5,000 पद हैं

दादू पंथ का संगठन:

  • दादू दयाल के 52 शिष्यों ने पंथ को राजस्थान भर में फैलाया
  • प्रमुख शिष्य: रज्जब, सुंदरदास, बखराना
  • पंथ की पाँच उप-शाखाएँ हैं: नागा (सशस्त्र), खाकी (भस्म-लेपी संन्यासी), उत्तरादे (उत्तरी शाखा), खाकसार (विनम्र), और निरंजनी
  • निरंजनी संप्रदाय — हरिदास निरंजनी द्वारा स्थापित; दादू पंथ से निकटता से संबद्ध; राजस्थान (डीग्गी कल्याण) में भी स्थित

रज्जब:

  • जन्म मुस्लिम (संगानेर, जयपुर की काजी परिवार में)
  • दादू दयाल के शिष्य बने; इस्लामी शब्दावली बनाए रखते हुए निर्गुण भक्ति अपनाई
  • सर्वांगी की रचना की — भक्ति और सूफी विचार का समन्वय करने वाला ~11,000 पदों का विशाल संग्रह
  • राजस्थान की संत परंपरा में गहनतम हिंदू-मुस्लिम समन्वय के प्रतीक

सुंदरदास:

  • दौसाई (जयपुर जिला) के व्यापारी परिवार से
  • दादू दयाल के शिष्य; बाद में शंकर की परंपरा में वेदांत का भी अध्ययन किया
  • सुंदर विलास और ज्ञान समुद्र की रचना की — निर्गुण भक्ति को अद्वैत वेदांत से समेटने वाले परिष्कृत दार्शनिक ग्रंथ
  • दादू के शिष्यों में सर्वाधिक बौद्धिक रूप से सशक्त माने जाते हैं

मीरा बाई

मीरा बाई (लगभग 1498–1547 CE) राजस्थान की सर्वाधिक प्रसिद्ध संत और अखिल-भारतीय भक्ति साहित्य की सबसे मान्यता प्राप्त विभूतियों में से एक हैं।

जीवन-परिचय:

  • जन्म: लगभग 1498 CE, कुड़की (अन्यथा चौकारी भी बताया गया) गाँव, मेड़ता, नागौर जिला; रतन सिंह राठौड़ की पुत्री
  • विवाह: मेवाड़ के युवराज भोज राज से (राणा साँगा के पुत्र); विवाह लगभग 1516 CE
  • वैधव्य: भोज राज के युद्ध में देहांत (लगभग 1521 CE) के बाद; सती होने से मना किया
  • मेवाड़ दरबार से संघर्ष: साधुओं के साथ सार्वजनिक रूप से गाती-नाचती थीं; दरबार ने उन्हें मारने का प्रयास किया (विषयुक्त दूध, साँप की टोकरी की किंवदंती — दोनों से बच गईं); विक्रम सिंह / राणा उदय सिंह ने उत्पीड़न किया
  • मेवाड़ त्याग: वृंदावन और फिर द्वारका गईं; द्वारका में निधन, लगभग 1547 CE
  • कोई संतान नहीं; बचपन से ही कृष्ण-भक्ति में जीवन अर्पित किया

रचनाएँ:

  • उन्हें ~1,300 भजन귀न का श्रेय दिया जाता है; अधिकांश ब्रज भाषा में राजस्थानी तत्त्वों के साथ, कुछ गुजराती में
  • पुनरावृत्त भाव: कृष्ण पति के रूप में, मीरा उनकी वधू के रूप में; माधुर्य भाव (— दाम्पत्य भक्ति)
  • प्रमुख रचनाएँ: "पायो जी मैंने राम रतन धन पायो," "म्हारो प्रभु गिरिधारी लाल," "जो तुम तोड़ो पिय मैं नहिं तोड़ूँ"
  • संग्रह: मीरा पदावली — मरणोपरांत संकलित

महत्त्व:

  • लैंगिक मानदंडों को चुनौती दी: अभिजात महिला ने घरेलू बंधनों को त्याग सार्वजनिक भक्ति अपनाई
  • जाति मानदंडों को चुनौती दी: रविदास (एक दलित चर्मकार-संत) को अपना गुरु स्वीकार किया
  • विवादित जीवनी: नारीवादी विद्वान मानते हैं कि बाद के ग्रंथों ने उत्पीड़न-वृत्तांत को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया होगा; उनकी भक्ति और रचनाओं की मूल ऐतिहासिकता सुस्थापित है

लाल दास और लालदासी संप्रदाय

लाल दास — अलवर-मेवात क्षेत्र के मेव मुस्लिम समुदाय में जन्मे; उनका लालदासी पंथ हिंदू मेवाती और मुस्लिम दोनों समुदायों के अनुयायियों को आकर्षित करता है। उनकी शिक्षाओं ने भक्ति को अस्पृश्यता-विरोध के साथ जोड़ा। प्राथमिक मंदिर शाहजहाँपुर (अलवर जिला) में है।

चरणदासी संप्रदाय

चरण दास:

  • जन्म: देहरा गाँव, बंदीकुई, दौसा/अलवर क्षेत्र; धूसर ब्राह्मण
  • जीवन का अधिकांश भाग दिल्ली में बिताया; संप्रदाय दिल्ली-आधारित है किंतु राजस्थान में इसकी गहरी जड़ें हैं
  • शिक्षाएँ: निर्गुण भक्ति, कठोर शाकाहार, अहिंसा, जाति का अस्वीकार
  • हिंदी ब्रज भाषा में 21 ग्रंथों की रचना की

चरणदासी संप्रदाय की महिला संत — RPSC मेन्स 2024 में सीधे पूछा गया:

  1. सहजो बाई: सहज प्रकाश की रचना — ब्रज भाषा का प्रसिद्ध भक्ति ग्रंथ; सरल-सीधी काव्य-शैली के लिए जानी जाती हैं
  2. दया बाई: दया बोध और विनय मालिका की रचना; 18वीं शताब्दी के उत्तर भारत में शिक्षित महिला संतों की परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं

दोनों महिलाएँ समकालीन थीं और चरण दास की शिष्याएँ थीं; उनकी रचनाएँ संप्रदाय की उपासना में आज भी सक्रिय हैं।