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इतिहास

संभावित प्रश्न एवं उत्तर

धार्मिक आस्थाएँ, संत, लोक देवता

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 14 / 15 0 PYQ 53 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

संभावित प्रश्न एवं उत्तर

प्र॰1 (5 अंक — 50 शब्द)

भारतीय परंपरा में 'ऋण' की अवधारणा स्पष्ट करो।

आदर्श उत्तर: भारतीय परंपरा में ऋण उन जन्मजात दायित्वों को संदर्भित करता है जो प्रत्येक मनुष्य देवताओं, ऋषियों और पूर्वजों के प्रति लेकर जन्म लेता है। तीन प्रमुख ऋण: देव ऋण (यज्ञ से चुकता), ऋषि ऋण (शास्त्राध्ययन और शिक्षण से), और पितृ ऋण (श्राद्ध/पिंड-दान से)। कुछ ग्रंथ चौथा — सहमानवों के प्रति मनुष्य ऋण (आतिथ्य से चुकता) भी जोड़ते हैं।


प्र॰2 (5 अंक — 50 शब्द)

चरणदासी संप्रदाय की दो महिला संतों पर टिप्पणी लिखो।

आदर्श उत्तर: चरणदासी संप्रदाय, जिसकी स्थापना देहरा (अलवर) के चरण दास (1703–1782 CE) ने की, ने दो प्रसिद्ध महिला संत दीं: सहजो बाई ने ब्रज भाषा में सहज प्रकाश और दया बाई ने दया बोधविनय मालिका की रचना की। दोनों ने निर्गुण भक्ति का समर्थन किया, जाति-भेद अस्वीकार किया और भक्ति परंपरा में महिलाओं की आध्यात्मिक समानता का प्रतिनिधित्व किया।


प्र॰3 (5 अंक — 50 शब्द)

राजस्थान में सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक के रूप में बाबा रामदेव का महत्त्व क्या है?

आदर्श उत्तर: बाबा रामदेव (जन्म लगभग 1405 CE, रूणिचा, जैसलमेर), एक तोमर राजपूत योद्धा-संत, हिंदू देवता और मुसलमानों के "रामसा पीर" दोनों के रूप में पूजे जाते हैं, जो उन्हें राजस्थान में हिंदू-मुस्लिम समन्वयात्मक भक्ति का सर्वाधिक प्रमुख प्रतीक बनाता है। हाजी मालेक (मुस्लिम पीर) के अधीन शिष्यत्व, निम्न जातियों के लिए चमत्कार, और रामदेवरा मेला (~5 लाख तीर्थयात्री, भाद्रपद शुक्ल 2–11) समन्वयात्मक संस्कृति के उदाहरण हैं।


प्र॰4 (5 अंक — 50 शब्द)

बिश्नोई संप्रदाय और उसके सामाजिक-पर्यावरणीय महत्त्व की व्याख्या करो।

आदर्श उत्तर: बिश्नोई संप्रदाय की स्थापना गुरु जाम्भेश्वर (जांभोजी) ने 1485 CE में पीपासर (नागौर) में की। यह वृक्ष-संरक्षण, पशु-कल्याण, शाकाहार और जाति-भेद अस्वीकार पर बल देने वाले 29 नियम निर्धारित करता है। खेजड़ली (1730) में खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए बिश्नोइयों का बलिदान (363 शहीद, अमृता देवी के नेतृत्व में) पर्यावरण इतिहास में एक मील का पत्थर है।


प्र॰5 (10 अंक — 150 शब्द)

चिश्ती और सुहरावर्दी सूफी सिलसिलों की तुलना, राजस्थान की समन्वयात्मक संस्कृति में उनके योगदान के विशेष संदर्भ में करो।

आदर्श उत्तर: चिश्ती और सुहरावर्दी दोनों सूफी सिलसिलों ने 12वीं से 17वीं शताब्दी के बीच राजस्थान की बहुलवादी धार्मिक संस्कृति में महत्त्वपूर्ण किंतु विशिष्ट योगदान दिया।

चिश्ती सिलसिला:

  • चिश्त (अफगानिस्तान) के मोईनुद्दीन चिश्ती द्वारा स्थापित; ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती (1141–1236 CE) द्वारा लगभग 1193 CE में अजमेर में स्थापित।
  • धर्मशास्त्र: सुलह-ए-कुल (सार्वभौमिक शांति); सभी जातियों और धर्मों के लिए खुली खानकाह; समा (भक्ति-संगीत — कव्वाली) को आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में बल।
  • सामाजिक अभ्यास: ख्वाजा ने निर्धनतम की सेवा की — उनकी खानकाह में आस्था और जाति की परवाह किए बिना प्रतिदिन 500 लोगों को भोजन मिलता था।
  • विरासत: अजमेर उर्स (रजब 1–6); प्रतिवर्ष ~1.5 लाख अंतर-धार्मिक तीर्थयात्री; मुगल सम्राट अकबर की पैदल तीर्थयात्राएँ (1562, 1568, 1570 CE); UNESCO-मान्यता प्राप्त कव्वाली विरासत।

सुहरावर्दी सिलसिला:

  • शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी (1145–1234 CE), बगदाद द्वारा स्थापित; हमीदुद्दीन नागौरी (1192–1274 CE) के माध्यम से राजस्थान में प्रवेश, नागौर में आधारित।
  • धर्मशास्त्र: राजकीय संरक्षण के साथ कठोर शरिया पालन; चिश्ती से अधिक राजनीतिक सत्ता से एकीकरण।
  • सामाजिक अभ्यास: चिश्ती सार्वभौमिकता की तुलना में पहुँच में अधिक चयनात्मक; मुस्लिम शासक वर्ग द्वारा सम्मानित।
  • विरासत: अजमेर के साथ-साथ राजस्थान में दूसरे सूफी केंद्र के रूप में नागौर; व्यापार-मार्गों के इस्लामीकरण में योगदान।

तुलनात्मक मूल्यांकन:

आयाम चिश्ती सुहरावर्दी
पहुँच सार्वभौमिक — सभी जातियाँ/धर्म चयनात्मक — मुख्यतः मुस्लिम
संगीत (समा) केंद्रीय आध्यात्मिक अभ्यास अनुमत किंतु केंद्रीय नहीं
राज्य संबंध शासकों से स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता के निकट
राजस्थान केंद्र अजमेर नागौर

निष्कर्ष: चिश्ती सिलसिले के सुलह-ए-कुल दर्शन ने राजस्थान का सर्वाधिक स्थायी समन्वयात्मक संस्कृति का उदाहरण बनाया — अजमेर की अंतर-धार्मिक दरगाह। सुहरावर्दी योगदान अधिक संस्थागत और दरबारी था, जिसने राजस्थान में इस्लाम की विद्वत्-परंपराओं को उसी व्यापक अंतर-समुदायी आकर्षण के बिना मजबूत किया।


प्र॰6 (10 अंक — 150 शब्द)

6वीं शताब्दी ईसा पूर्व के धार्मिक आंदोलनों और निर्गुण भक्ति आंदोलन के बीच समानताएँ रेखांकित करो।

आदर्श उत्तर: 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व के धार्मिक आंदोलन (बौद्ध धर्म, जैन धर्म) और मध्यकालीन निर्गुण भक्ति आंदोलन (14वीं–17वीं शताब्दी CE) दोनों ब्राह्मणिक रूढ़िवाद के विरुद्ध शक्तिशाली सामाजिक-धार्मिक विद्रोह थे।

प्रमुख समानताएँ:

  1. जाति-विरोधी दृष्टिकोण: 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आंदोलनों ने सभी जातियों के लिए मठवासी व्यवस्था खोली — बुद्ध ने वर्ण की परवाह किए बिना शिष्य स्वीकार किए। निर्गुण संत स्वयं हाशिए की जातियों से थे: कबीर (जुलाहा), रैदास (चमार), दादू दयाल (धुनिया, राजस्थान)।

  2. कर्मकांड का अस्वीकार: दोनों ने मोक्ष के मार्ग के रूप में वैदिक यज्ञ और पुरोहिती कर्मकांड को अस्वीकार किया। निर्गुण संतों ने भी मूर्ति-पूजा, तीर्थ और पुरोहित-मध्यस्थता को आध्यात्मिक रूप से रिक्त बताकर अस्वीकार किया।

  3. लोकभाषा माध्यम: बौद्ध धर्म ने पालि का, जैन धर्म ने अर्ध-मागधी का प्रयोग किया — संस्कृत के एकाधिकार के विरुद्ध स्थानीय भाषाएँ। निर्गुण संतों ने ब्रज भाषा, अवधी और राजस्थानी में रचना की, साक्षरता स्तरों के पार धार्मिक अभिव्यक्ति को जनतांत्रिक बनाया।

  4. वैयक्तिक आध्यात्मिक मार्ग: बौद्ध धर्म का व्यक्तिगत अष्टांगिक मार्ग (आर्य अष्टांग मार्ग) और जैन धर्म का सम्यक आचरण के माध्यम से वैयक्तिक मोक्ष, निर्गुण भक्ति की निराकार दिव्य के प्रति प्रत्यक्ष भक्ति के समानांतर है — दोनों पुरोहित-मध्यस्थता को बाईपास करते हैं।

  5. अहिंसा: बौद्ध और जैन दोनों ने अहिंसा को केंद्रीय बनाया। राजस्थान की संत परंपरा ने अहिंसा और शाकाहार पर बल दिया — बिश्नोई संप्रदाय (1485 CE) ने इसे सर्वाधिक स्पष्ट रूप से संस्थागत किया।

प्रमुख अंतर: 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आंदोलनों ने वैदिक सत्ता को पूर्णतः अस्वीकार किया (नास्तिक)। कबीर और दादू दयाल जैसे निर्गुण भक्ति संत व्यापक रूप से हिंदू ढाँचे के भीतर काम करते थे, कभी-कभी वेदांतिक अवधारणाओं का उल्लेख करते थे — वे व्यवस्थित रूप से नास्तिक नहीं थे।

निष्कर्ष: दोनों आंदोलन सामाजिक दमन और संस्थागत धार्मिक एकाधिकार से उभरे; उनकी स्थायी विरासत जाति और लिंग की सीमाओं से परे आध्यात्मिक पहुँच के जनतंत्रीकरण में निहित है, जिसने भारत के बहुलवादी लोकाचार को आकार दिया।