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इतिहास

लोक देवता एवं लोक देवी

धार्मिक आस्थाएँ, संत, लोक देवता

पेपर I · इकाई 1 अनुभाग 3 / 15 0 PYQ 53 मिनट

सार्वजनिक अनुभाग पूर्वावलोकन

लोक देवता एवं लोक देवी

लोक देवता की अवधारणा

लोक देवता ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित मानवीय व्यक्तित्व हैं — योद्धा, चिकित्सक, रक्षक — जिन्हें मृत्यु के पश्चात् उनके द्वारा सेवित समुदायों ने देवता का दर्जा दिया। ब्राह्मणिक देवताओं के विपरीत, लोक देवताओं के ऐतिहासिक उद्गम प्रमाणित हैं (लगभग 9वीं–15वीं शताब्दी CE), इनकी उपासना संस्कृत ग्रंथों के बजाय मौखिक महाकाव्य परंपराओं के माध्यम से होती है, और ये बिना पुरोहित-मध्यस्थता के सभी जातियों के लिए सुलभ हैं।

भोपा-भोपी परंपरा इसका अनुष्ठान-वाहन है: एक वंशानुगत पुजारी-दंपती एक चित्रित पट (फड़) के सामने रात भर देवता का महाकाव्य गाता है। फड़ स्वयं पवित्र मानी जाती है — इसे मोड़ा नहीं जा सकता, इसका मुख पूर्व दिशा में होना चाहिए, और पाठ से पहले इसकी पूजा की जाती है। इस परंपरा को 2010 में रम्मन एवं सम्बद्ध परंपराओं के अंग के रूप में UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में सम्मिलित किया गया।

पाँच प्रमुख लोक देवताओं के पारंपरिक समूह को पंचपीर कहते हैं — यह शब्द स्वयं इस पूजा के हिंदू-मुस्लिम समन्वयात्मक स्वरूप को दर्शाता है, क्योंकि "पीर" किसी पवित्र पुरुष के लिए इस्लामी शब्द है।

पाँच प्रमुख लोक देवता

1. पाबूजी

  • उद्गम: कोलू ग्राम, फलोदी तहसील, जोधपुर जिला
  • समुदाय: राठौड़ राजपूत; मुख्यतः रेबारी (ऊँट-पालक) और नायक समुदायों द्वारा पूजित
  • भूमिका: ऊँटों और मवेशियों के रक्षक; महामारी/प्लेग के देवता (पाबू री ताप — पाबू की महामारी)
  • पौराणिक कथा: एक विधवा के ऊँटों की जिंदराव खींची से रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की — यह जीवन की कीमत पर वचन-पालन की कथा है
  • अनुष्ठान: पाबूजी री फड़ — हाथ से चित्रित ~15 मीटर लंबा कपड़ा जो पाबूजी का जीवन चित्रित करता है — पूजा-वस्तु है। नायक समुदाय के भोपे रावणहत्था वाद्य के साथ महाकाव्य गाते हैं।
  • भौगोलिक विस्तार: जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर, पाली जिले

2. गोगाजी

  • उद्गम: ददरेवा गाँव, रतनगढ़ तहसील, चुरू जिला
  • अन्य नाम: ज़ाहिर पीर — हनुमानगढ़, गंगानगर क्षेत्र में मुसलमानों द्वारा पूजित
  • भूमिका: साँप के देवता; साँप के काटने से रक्षा करते हैं; जाट, गुर्जर और मुस्लिम समुदायों के देवता
  • पौराणिक उद्गम: बछल और जाहर (राजपूत वंश) के पुत्र; गोरखनाथ से आशीर्वाद प्राप्त किया
  • प्रमुख मेला: गोगामेड़ी, नोहर तहसील, हनुमानगढ़ — भाद्रपद कृष्ण 9 (गोगा नवमी) को
  • विशेषता: गोगा मेड़ी (मंदिर संरचना) मस्जिद जैसी दिखती है; हिंदू-मुस्लिम समन्वय को दर्शाती है

3. बाबा रामदेव / रामदेवजी / राम देव पीर

  • उद्गम: रूणिचा गाँव (अब रामदेवरा), सम तहसील, जैसलमेर जिला
  • वंश: तोमर राजपूत; एक मुस्लिम पीर — हाजी मालेक के शिष्य, जिससे हिंदू-मुस्लिम समन्वय का सूत्रपात हुआ
  • विशिष्ट स्थान: हिंदुओं द्वारा कृष्ण/विष्णु के अवतार के रूप में और मुसलमानों (विशेषतः गुजरात के कंबोजा/मेर) द्वारा "रामसा पीर" के रूप में पूजित — एकमात्र लोक देवता जिन्हें यह दोहरी श्रद्धा प्राप्त है
  • भूमिका: समानता, अस्पृश्यता का उन्मूलन; उन्हें लँगड़े और अंधों को ठीक करने जैसे चमत्कारों का श्रेय दिया जाता है
  • पौराणिक कथा: अलौकिक "पाँचपिपली" शक्तियों को पराजित किया; निम्न जातियों की रक्षा की
  • प्रमुख मेला: रामदेवरा मेला, जैसलमेर — भाद्रपद शुक्ल 2 से 11 (नौ दिन); प्रतिवर्ष ~5 लाख तीर्थयात्री आते हैं
  • अन्य स्थल: पोखरण (जैसलमेर), मसूरिया (जोधपुर), और पश्चिमी राजस्थान एवं गुजरात में हजारों ग्राम मंदिर

4. तेजाजी

  • उद्गम: खरनाल गाँव, नागौर जिला; गुर्जर-जाट समुदाय के
  • भूमिका: मवेशियों के रक्षक; जाट और गुर्जर समुदायों के देवता; साँप के काटने के विरुद्ध पूजे जाते हैं
  • पौराणिक कथा: एक प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए साँप को स्वयं काटने दिया; एक महिला के मवेशियों की रक्षा करते हुए वीरगति पाई
  • प्रमुख मेला: परबतसर मेला, नागौर — भाद्रपद शुक्ल 10 से पूर्णिमा तक; ~1.5 लाख पशु-लेन-देन वाला प्रमुख पशु-व्यापार मेला
  • अन्य मेले: बाँगड़ (अजमेर), सुरसुरा (अजमेर)
  • क्षेत्रीय विस्तार: अजमेर, नागौर, जयपुर, टोंक, भीलवाड़ा जिले

5. हरभूजी

  • उद्गम: भेंटू गाँव, फलोदी तहसील, जोधपुर जिला; सांखला राजपूत
  • भूमिका: मवेशियों के रक्षक; इन्हें भविष्यवाणियाँ और दैवज्ञान का श्रेय दिया जाता है; पाबूजी से संबद्ध
  • महत्त्व: पंचपीर समूह का अंग, पाँच की संख्या पूर्ण करते हैं; अन्य चार की तुलना में कम अखिल-क्षेत्रीय, किंतु पश्चिमी राजस्थान में महत्त्वपूर्ण

6. मेहाजी मांगलिया — प्रायः छठे लोक देवता के रूप में उल्लिखित

  • उद्गम: बापिनी गाँव, जोधपुर; मांगलिया राजपूत
  • भूमिका: घोड़ों के रक्षक; मारवाड़ के गुर्जर और राजपूत समुदायों के देवता
  • मेला: बापिनी गाँव (जोधपुर), भाद्रपद शुक्ल 8

राजस्थान की लोक देवियाँ

लोक देवियाँ मुख्यतः शाक्त अभिमुखता वाली हैं — मातृ देवी के प्रकटीकरण के रूप में पूजित — किंतु विशिष्ट सामुदायिक संबद्धताओं के साथ गहराई से स्थानीयकृत हैं, विशेषतः राजपूत राजवंशों के साथ।

करणी माता:

  • मंदिर: देशनोक, बीकानेर जिला
  • समुदाय: चारण समुदाय; बीकानेर राजघराने की कुलदेवी
  • किंवदंती: यम (मृत्यु के देवता) को एक बच्चे की आत्मा लेने से मना किया; प्रतिदान में, सभी चारण पुनः मानव रूप लेने से पहले चूहे के रूप में जन्म लेंगे — इसीलिए मंदिर में ~20,000 पवित्र चूहे (काबा) हैं
  • ऐतिहासिक संबंध: 1488 CE में राव बीका को बीकानेर नगर की स्थापना से पहले आशीर्वाद दिया; उन्हें राज्य स्थापित करने का अधिकार प्रदान किया
  • महत्त्व: बीकानेर और बाड़मेर क्षेत्र के सभी समुदायों द्वारा माता के रूप में पूजित

जीण माता:

  • मंदिर: रेवासर गाँव, सीकर जिला (शेखावाटी)
  • अनुमानित उद्गम: लगभग 800 CE; मंदिर ~1,000 वर्ष पुराना माना जाता है
  • किंवदंती: जीण और उसके भाई हर्ष चाहमान (चौहान) राजपूत थे; एक कंगन पर विवाद हुआ; जीण ने संन्यास ले लिया और दिव्यता प्राप्त की
  • समीपवर्ती मंदिर: जीण माता मंदिर के सामने पहाड़ी पर हर्ष देवता मंदिर — दोनों एक साथ तीर्थस्थल हैं
  • महत्त्व: राज्य-स्तरीय शक्ति पीठ; नवरात्रि उत्सवों में ~2 लाख तीर्थयात्री आते हैं

कैला देवी:

  • मंदिर: करौली जिला, कालीसिल नदी के तट पर
  • समुदाय: यादव समुदाय की कुलदेवी; मीणा और अन्य समुदायों द्वारा भी पूजित
  • प्रमुख मेला: कैला देवी मेला (चैत्र शुक्ल 1–8) — राजस्थान के तीन सबसे बड़े मेलों में से एक
  • राजकीय संबंध: करौली राजपूत राजघराने की कुलदेवी

शिला देवी:

  • मंदिर: आमेर किला, जयपुर जिला
  • समुदाय: कछवाहा राजपूत वंश और जयपुर राजघराने की कुलदेवी
  • इतिहास: मान सिंह प्रथम (1589 CE) ने अपने सैन्य अभियान के बाद जेसोर (बंगाल) से लाई गई देवी की मूर्ति स्थापित की; देवी का नाम शिला देवी रखा गया
  • महत्त्व: यहाँ नवरात्रि पूजा राजघराने की परंपरा बनी हुई है

तनोट माता:

  • मंदिर: तनोट गाँव, जैसलमेर जिला (पाकिस्तान सीमा के निकट, जैसलमेर शहर से ~120 किमी)
  • किंवदंती: 1965 और 1971 के युद्धों में पाकिस्तानी गोलाबारी के दौरान मंदिर अक्षुण्ण रहा — क्षेत्र में कथित रूप से 3,000 बम गिरे, किंतु मंदिर के पास कोई नहीं फटा
  • प्रबंधन: 1971 से BSF (सीमा सुरक्षा बल) मंदिर का रखरखाव और प्रशासन करती है
  • स्थिति: दैवीय सुरक्षा का प्रतीक; BSF कर्मियों और नागरिकों के लिए प्रमुख तीर्थस्थल