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राजस्थान में जैन धर्म
ऐतिहासिक उपस्थिति
राजस्थान में जैन धर्म की निरंतर उपस्थिति कम से कम 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व से है — महावीर (599–527 ईसा पूर्व, या कुछ परंपराओं के अनुसार 540–468 ईसा पूर्व) के काल से, जो 24वें तीर्थंकर थे। राजस्थान के व्यापारी समुदाय (विशेषतः ओसवाल और महेश्वरी) ने जैन धर्म को व्यापारी वर्ग का प्रमुख धर्म बनाया।
राजस्थान में जैन संप्रदाय:
| संप्रदाय | विशेषताएँ | राजस्थान में प्रभुत्व |
|---|---|---|
| श्वेतांबर | मुनि श्वेत वस्त्र पहनते हैं; मठवासी व्यवस्था में महिलाओं को शामिल करते हैं; 12 आगमों को स्वीकार करते हैं; मानते हैं कि महावीर विवाहित थे | प्रभावशाली — राजस्थान के अधिकांश जैन मंदिर श्वेतांबर हैं |
| दिगंबर (— "आकाश-आवरण") | मुनि सभी वस्त्र त्यागते हैं; महिलाओं के लिए कोई मठवासी व्यवस्था नहीं; सभी आगमों को लुप्त मानकर अस्वीकार करते हैं; महावीर ब्रह्मचारी थे | उपस्थित किंतु अल्पसंख्यक; कर्नाटक, महाराष्ट्र में अधिक |
| स्थानकवासी | श्वेतांबर के अंतर्गत सुधार संप्रदाय; मूर्ति-पूजा अस्वीकार; मुँह पर कपड़ा पहनते हैं | राजस्थान में उपस्थित, विशेषतः मारवाड़ में |
स्रोत: भारत की जनगणना 2011; डंडास, "द जैन्स" (2002)
राजस्थान में प्रमुख जैन तीर्थस्थल
दिलवाड़ा मंदिर, माउंट आबू (सिरोही जिला):
- निर्माण: विमल वसाही — विमल शाह (गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम के मंत्री) द्वारा 1031 CE में आदिनाथ (1ले तीर्थंकर) के लिए निर्मित
- लूना वसाही — गुजरात के मंत्री तेजपाल और वास्तुपाल द्वारा 1230–1232 CE में नेमिनाथ (22वें तीर्थंकर) के लिए निर्मित
- स्थापत्य विशिष्टता: श्वेत संगमरमर नक्काशी अत्यंत जटिल — लटकते कमल झुमकों (एक पतले संगमरमर के डंठल पर केंद्रीय पदक से लटकते) वाली छतें, संगमरमर इतना पारदर्शी कि भीतर से चमकता है
- स्थिति: मध्यकालीन भारतीय मंदिर स्थापत्य के सर्वोत्तम उदाहरणों में से एक; UNESCO विश्व विरासत स्थल नामांकन (प्रक्रियाधीन)
रणकपुर जैन मंदिर, पाली जिला:
- समर्पित: आदिनाथ (— 1ले तीर्थंकर)
- निर्माण: 1437–1458 CE में धरना शाह, एक व्यापारी द्वारा; मेवाड़ के राणा कुंभा द्वारा वित्त पोषित
- स्थापत्य पहचान: 1,444 नक्काशीदार स्तंभ — कोई दो एक जैसे नहीं; चतुर्दिशीय मंदिर (चौमुखा —) जिसमें देवता चारों दिशाओं में मुँह किए हैं
- सामग्री: मकराना खदानों से हल्के क्रीम रंग का संगमरमर
नाकोड़ा जैन मंदिर, बाड़मेर जिला:
- पार्श्वनाथ (23वें तीर्थंकर) को समर्पित; संबद्ध देवता नाकोड़ा भैरव सभी धर्मों के तीर्थयात्रियों को आकर्षित करते हैं
महावीर जी, करौली जिला:
- राजस्थान का सबसे महत्त्वपूर्ण जैन तीर्थ मेला; वार्षिक चैत्र शुक्ल मेला
- दिगंबर मंदिर समिति द्वारा प्रशासित
राजस्थान की संस्कृति पर जैन प्रभाव
- अहिंसा और शाकाहार: जैन व्यापारी समुदाय के प्रभुत्व ने राजस्थान की प्रधानतः शाकाहारी भोजन संस्कृति को आकार दिया, विशेषतः मारवाड़ी व्यंजन में
- पांडुलिपि संरक्षण: जैन मठों (उपाश्रय —) ने मध्यकालीन राजस्थान में सबसे बड़े पांडुलिपि पुस्तकालय (भंडार) बनाए रखे; जैसलमेर किला पुस्तकालय और पाटन (गुजरात) में हजारों संस्कृत और प्राकृत पांडुलिपियाँ संरक्षित हैं
- कला-संरक्षण: जैन व्यापारियों ने सबसे महँगे मंदिर बनवाए और सर्वोत्तम पांडुलिपियाँ लिखवाईं — राजस्थान की कल्पसूत्र सचित्र पांडुलिपियाँ (15वीं शताब्दी CE) मध्यकालीन भारतीय चित्रकला की सबसे प्रसिद्ध कृतियों में हैं
- जैन जनसंख्या: जनगणना 2011 में राजस्थान में ~622,000 जैन (~राज्य जनसंख्या का 0.9%) दर्ज; जिला स्तर पर जैसलमेर और बाड़मेर में भारतीय राज्यों में उच्चतम जैन प्रतिशत
