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अहमदिया आंदोलन एवं धार्मिक सुधार
अहमदिया आंदोलन — RPSC मेन्स 2024 में सीधे परीक्षित
संस्थापक: मिर्जा गुलाम अहमद
स्थापना स्थान: कादियाँ, पंजाब (अब पाकिस्तान में)
वर्ष: 1889 CE
मूल विश्वास:
- मिर्जा गुलाम अहमद ने मेहदी, वादे किए गए मसीह और ईसा के दूसरे आगमन होने का दावा किया — ये सभी दावे मुख्यधारा के मुसलमानों में विवादास्पद हैं
- अहमदी कुरान और पैगंबर मुहम्मद को मानते हैं किंतु नबूवत की अंतिमता (खात्म-ए-नबूवत) को अस्वीकार करते हैं, जो उन्हें मुख्यधारा के सुन्नी और शिया इस्लाम से बाहर रखता है
- इस्लाम की तर्कसंगत व्याख्या पर बल दिया; जिहाद को सशस्त्र युद्ध के रूप में अस्वीकार किया; आध्यात्मिक सुधार पर ध्यान केंद्रित किया
विवाद:
- पाकिस्तान की संसद द्वारा पाकिस्तान के संविधान में दूसरे संशोधन (1974) के माध्यम से गैर-मुस्लिम घोषित
- पाकिस्तान में अध्यादेश XX (1984) के तहत उत्पीड़ित, जो अहमदियों को स्वयं को मुस्लिम कहने या सार्वजनिक रूप से इस्लामी अनुष्ठान करने से रोकता है
- भारत में: एक अल्पसंख्यक; कादियाँ (गुरदासपुर, पंजाब) में मुख्यालय उनका विश्व केंद्र बना हुआ है
दो शाखाएँ:
- कादियानी (लाहौर उप-संप्रदाय): कादियाँ में आधारित; मिर्जा गुलाम अहमद एक पैगंबर थे
- लाहौरी (लाहौर अहमदिया आंदोलन): लाहौर में आधारित; मिर्जा गुलाम अहमद एक सुधारक थे, पैगंबर नहीं
सार्वभौमिक पुरोहिती — RPSC PYQ 2023
सार्वभौमिक पुरोहिती मुख्यतः प्रोटेस्टेंट ईसाइयत (विशेषतः लूथरन-कैल्विनवादी परंपरा) से जुड़ी अवधारणा है, यद्यपि भारतीय सुधार आंदोलनों में इसकी समानांतर धाराएँ हैं।
- प्रोटेस्टेंट संदर्भ: मार्टिन लूथर का सिद्धांत (1520 CE) कि प्रत्येक बपतिस्मा प्राप्त ईसाई को पुरोहित-मध्यस्थता के बिना, विश्वास और शास्त्र के माध्यम से, ईश्वर तक सीधी पहुँच है
- भारतीय समानताएँ: संत/भक्ति परंपरा का ब्राह्मण पुरोहिती से अस्वीकार सार्वभौमिक पुरोहिती की भावना के समानांतर है — कबीर का दोहा "ना कोई का बाप" या दादू दयाल की शिक्षा कि प्रत्येक व्यक्ति निराकार ईश्वर के समान रूप से निकट है
- RPSC संदर्भ: प्रश्न सम्भवतः यह परखता है कि विद्यार्थी इसे धार्मिक सुधार इतिहास की एक अवधारणा के रूप में समझते हैं — पश्चिमी (प्रोटेस्टेंट सुधार, 1517 से) और भारतीय (निर्गुण भक्ति, 14वीं–17वीं शताब्दी CE) दोनों परंपराओं ने स्वतंत्र रूप से यह विचार विकसित किया कि आध्यात्मिक अधिकार व्यक्ति को है, पुरोहित वर्ग को नहीं
6वीं शताब्दी ईसा पूर्व के धार्मिक आंदोलन — RPSC PYQ 2024 (10 अंक)
"6वीं शताब्दी ईसा पूर्व के धार्मिक आंदोलनों और निर्गुण भक्ति आंदोलन के बीच समानताएँ रेखांकित करो" प्रश्न के लिए दो भिन्न ऐतिहासिक कालखंडों की तुलना आवश्यक है:
6वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आंदोलन: बौद्ध धर्म (गौतम बुद्ध, लगभग 563–483 ईसा पूर्व) और जैन धर्म (महावीर, 599–527 ईसा पूर्व) — इस काल के दो प्रमुख विधर्मी आंदोलन
निर्गुण भक्ति (लगभग 14वीं–17वीं शताब्दी CE): कबीर, दादू दयाल, रैदास, नानक
समानताएँ:
| आयाम | 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आंदोलन | निर्गुण भक्ति आंदोलन |
|---|---|---|
| जाति-विरोधी | बौद्ध और जैन दोनों ने वर्ण-पदानुक्रम को अस्वीकार किया; सभी जातियों से शिष्य स्वीकार किए | कबीर (जुलाहा), रैदास (चमार), दादू (धुनिया); सभी ने जाति-भेद अस्वीकार किया |
| कर्मकांड-विरोधी | मोक्ष के साधन के रूप में वैदिक पशु-बलि और पुरोहिती कर्मकांड (यज्ञ) को अस्वीकार किया | मूर्ति-पूजा, तीर्थ, कर्मकांडीय शुद्धता और पुरोहित-मध्यस्थता को अस्वीकार किया |
| लोकभाषा | पालि (बौद्ध) और अर्ध-मागधी (जैन) — संस्कृत नहीं, स्थानीय भाषाएँ | ब्रज भाषा, अवधी, राजस्थानी — संस्कृत नहीं, लोकभाषाएँ |
| वैयक्तिक मार्ग | व्यक्तिगत प्रयास (शील-समाधि-प्रज्ञा; सम्यक आचरण-सम्यक ज्ञान) केंद्रीय; बौद्ध धर्म में ईश्वर की आवश्यकता नहीं | व्यक्तिगत भक्ति; पुरोहित के बिना निराकार ईश्वर से सीधा संबंध |
| सामाजिक पहुँच | खुली मठवासी व्यवस्था; महिलाओं को स्वीकार किया (बौद्ध नन — भिक्खुनी); व्यापारी, शिल्पकार स्वागत किए गए | जुलाहा (कबीर), चमार (रैदास), धुनिया (दादू), महिला (मीरा) समुदायों के संत |
| अहिंसा | बौद्ध और जैन दोनों ने अहिंसा पर बल दिया | संत परंपरा ने अहिंसा, शाकाहार पर बल दिया |
| ब्राह्मण एकाधिकार-विरोधी | कर्मकांड और धार्मिक अधिकार पर ब्राह्मण नियंत्रण को चुनौती दी | आध्यात्मिक ज्ञान पर ब्राह्मण एकाधिकार को चुनौती दी |
प्रमुख अंतर: 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व के आंदोलनों ने वैदिक सत्ता को पूर्णतः अस्वीकार किया (नास्तिक); कबीर और दादू दयाल जैसे निर्गुण भक्ति संत व्यापक रूप से हिंदू ढाँचे के भीतर काम करते थे, कभी-कभी वेदांतिक अवधारणाओं का उल्लेख करते थे, यद्यपि औपचारिक कर्मकांड को अस्वीकार करते थे — वे व्यवस्थित रूप से नास्तिक नहीं थे।
